Latest Updates

साहित्यिक आयोजनों में जुगलबंदी का जाल

(अकादमियों और संस्थानों की बंद दुनिया में अपनों का उत्सव) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय साहित्यिक परिदृश्य सदैव से विविधता, विचारशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ शब्द केवल रचना नहीं होते, बल्कि समाज के अनुभव, संघर्ष, संवेदनाएँ और परिवर्तन की आकांक्षाएँ भी अभिव्यक्त करते हैं। परंतु वर्तमान…

Read More

सफलता की दौड़ में बुनियादी शिक्षा का पतन

डॉ विजय गर्ग  आज का समय प्रतिस्पर्धा का समय है। हर विद्यार्थी, हर अभिभावक और हर संस्थान एक ही लक्ष्य की ओर भाग रहा है—सफलता। लेकिन इस अंधी दौड़ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है: क्या हम वास्तव में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, या केवल परीक्षा पास करने की कला…

Read More

युद्ध के विनाश से सहमा विश्व

राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तवइजराल-अमेरिका और ईरान का युद्ध अब विभीषिका बनता जा रहा है । लगभग एक माह से चल रहे इस युद्ध ने अब सम्पूर्ण विश्व पटल को सहमा दिया है । युद्ध क्यों हो रहा है इसे कोई सम ही नहीं पा रहा है पर इसके दुष्पिरिणामों से जनसमुदाय परेशान अवश्य है…

Read More

दहेज़ नहीं लिया… या बस नाम बदल दिया?

(एक रुपये के दिखावे के पीछे छिपा “भात” और “रिवाज़” का सच—क्या सच में खत्म हो रही है दहेज़ प्रथा या सिर्फ बदल रहा है उसका रूप?) — डॉ. सत्यवान सौरभ भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता है। यह संबंध परंपराओं, रीति-रिवाज़ों और सामाजिक…

Read More

आजकल के स्कूलो ने ही किसी को दलित तो किसी को सवर्ण  बना डाला….

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  हममें से जितने भी लोग नब्बे के दशक में सरकारी या निजी स्कूलों में पढ़े हैं उनको याद होगा सुबह के  समय असेंबली की शुरुआत प्रार्थना से और राष्ट्गान से होता था और समापन पीटी से होती थी और अंत में सभी शिक्षकों का चरण स्पर्श…

Read More

फूहड़ कंटेंट, सोशल मीडिया और संस्कृति: जिम्मेदारी किसकी?

– डॉ. प्रियंका सौरभ डिजिटल युग ने हमारे समाज की संरचना, सोच और अभिव्यक्ति के तरीकों को गहराई से बदल दिया है। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है—जहां पहले मनोरंजन और…

Read More

बरसो पहले फागुन बीत गया…..अब बुरा मान जाओ 

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  वैश्विक  युद्ध में मेरा पक्ष बस इसी बात से तय होगा कि टीएमसी  किस पक्ष में खड़ी हैं। अगर आज ममता दीदी  कह दें कि वो ईरान खामनेई गैंग से साहनुभूति अनुभूति और ताल्लुक रखती है तो कसम युसूफ पठान कि मैं कल ही फेसबूकिया कामरेड…

Read More

खाड़ी का सामान्य जीवन और मीडिया की युद्ध-छाया”

— एक प्रवासी भारतीय (NRI) की नज़र से पिछले कुछ दिनों से भारतीय टीवी चैनलों और मीडिया पर खाड़ी देशों को लेकर लगातार तनाव और युद्ध की आशंकाओं से जुड़ी खबरें दिखाई जा रही हैं। तेज़ संगीत, लाल पट्टियों में चमकती “ब्रेकिंग न्यूज़” और बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ—इन सबके बीच ऐसा माहौल बन जाता है मानो पूरा…

Read More

कटौती की मार कर्मचारियों पर, विधायकों के बढ़ते भत्ते

(जब कर्मचारियों की आर्थिक सुविधाएँ घटती दिखाई दें और दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के भत्ते और पेंशन बढ़ते रहें, तब स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के संतुलन और न्याय पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं।) — डॉ. सत्यवान सौरभ हाल के समय में सरकारी कर्मचारियों के बीच एक निर्णय को लेकर व्यापक चर्चा और असंतोष देखा जा…

Read More

मानवता और भारतीय संस्कृति

लक्ष्य करने की बात है कि  संघर्ष के इस युग मे जब संघर्ष का कोई बौद्धिक कारण नहीं मिलता तो यही समझ में आता है किहिंसक और कुछ हद तक अहिंसक संघर्ष भी क्रोध स्वार्थऔर संकुचित मानस की उपज है । आध्यात्मिक गुरुओं और जीवनदिशा निर्देशक महापुरुषों ने स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन में…

Read More