कविता और कहानी
डॉक्टर सरोजिनी प्रीतम कहिन
आदर्श छात्र ने कहा-आचार्य महासमर के लिए आदर्श स्थिति कहो वे हंसकर बोले’- आखों पर पटटी-/ बुद्धि पर पर्दा और सेनापति – धृतराष्ट्र हो ठाठ धोबी के कुत्तों के न तो – घर –घाट फिर भी – अलग ही ठाठ नमक आमलेट खाने लगे … स्वाद बिगड़ गया पत्नी पर चिल्लाये … घर में नमक…
लघुकथा – कर्मठ : डोली शाह
बचपन में ही राहुल को मां छोडकर इस दुनिया से चली गयी तो पिता ने घर के साथ खेती-बाड़ी का काम संभाल कर मा की कमी को पूरा करते हुए उसकी परवरिश की । राहुल भी जब कुछ बडा हुआ तो वह भी पिता के हर कार्यों में हाथ बंटाता साथ मे पढने के लिए …
देवेन्द्र पाठक ‘महरूम’ की ग़ज़लें
एक धुँआते ही न रहो सुलगके जलो दहको जलाके ख़ाक करो हर सियासती छल को घुन गये बांस- बत्ते, धसक रहीं दीवारें वक़्त रहते बचा लो टूटते- ढहते घर को जो आहे- दीनो- बेकुसूर कहर बरपा दे बचा न पाओगे अपने ग़ुरूर के घर को लहू भाई का सगे भाई के लहू से ज़ुदा दे…
ख्वाबों में टहलती है
रह-रह के बुलाती है,तेरी याद अकेले में। इन पलकों की गलियों में , आवारा घूंमती है। ख्वाबों में टहलती है,तेरी याद अकेले में। पागल सी बनाती है, दीवानी बनाती है, मस्ताने गीत लिखती,तेरी याद अकेले में। जब आती है चुपके से, मुस्काती है धीरे से, सीने से लिपटती है,तेरी याद अकेले में। छूकर तुझे आती…
आत्मालाप –
आत्मा चोला बदलती है— “अरेरे. आत्मा तो चोला बदलती है- सब पुण्यात्माओ के लिये लोग-बाग कहते थे/फिर उन्हें जब ‘आत्मा’ कहा था तो—-‘ चोला डालकर —–‘ कहीं सो गये होगे ? अभी तक- चोला बदल नही पाये होगे – अरे रे गले से नया चोला उतरा ही नहीं होगा…!! जानकर गले में अटका कर दिनभर…
आज की आवाज
शोषित पीड़ित की ढाल था जो, अब समुदायों की ढाल बना। अल्पसंख्यक का हार बना, यह देश के हित जंजाल बना।। कानून को ढाल बनाकर के, तुम अपने निज़ हित साध रहे। स्वारथ में इतने डूब गए, कर देश को तुम बर्बाद रहे।। याद करो कुछ पिछली भी, हम क्या सह कर के आए हैं।…
परवरिश : डॉक्टर अरुणा पाठक
हर किसी को आते जाते…….. वह घर अपनी और आकर्षित करता था। करें क्यों ना आसपास के पूरे क्षेत्र में इतना सुंदर इतना महंगा इतना आलीशान घर, दूसरा नहीं था। वहां से गुजरने वाले उस घर को जरूर देखते बाहर एक बड़ी सी गाड़ी खड़ी रहती. और उसमें टोपी पहना हुआ ड्राइवर बैठा रहता। अक्सर…
उम्र के पड़ाव पर रिश्तों व समाज की जरूरत
जैसा कि हम सभी जानते हैं मानव जीवन में समाज, धर्म, जाती, रिश्ते, परिवार आदि की समय समय पर एक दूसरे की जरूरत रहती हैं। परन्तु आज के युग में मानव जीवन की जटिलता कहो या अपने स्वार्थ के लिए समाज, धर्म, रिश्तों को निभाने में टाल मटोल करता है, जिस से समाजों के बिखराव…
छंद- गीतिका : यह समझ
मापनी- 2122 2122 2122 212 पदांत- यह समझ समांत- अहले साँस चलती है समय से तेज पहले यह समझ। चल सके तो वक़्त के ही संग बहले यह समझ। पंचतत्वों से बना अनमोल है यह तन मिला, ये बचें इनके लिए हर कष्ट सहले यह समझ। यह अगर हैं संतुलित तो मानले तू है सुखी,…
स्वप्नों की मनमानी
लगे झरने नव छंद नेहिल, पिघलता नील का आँगन है। भींग रहा अवनि का आँचल, सरस अंतर का प्रांगण है। नैनो में मनुहार लिए, व्यापा मौन दिशाओं में। आस सिंचित रहती हर पल, तरंगित सी आशाओं में। मृदुल से दो बोल कहीं से, कानों में रस घोल गई।…
