कविता और कहानी
उठो द्रोपती वस्त्र सभालो
उठो द्रोपती वस्त्र सभालो, अब कृष्ण नहीं आएगा.घर घर में दुशाशन बैठा, वस्त्र कँहा से लाएगा..दर्योधन के मित्र कर्ण, तुम्हे थनों में मिल जायेंगे.अपनी बीती कंहोगी ज़ब तुम, तुम पर दाग लगाएंगे..कोई न होगा तेरा अबला, कोई न धीर बधाएँगा.उठो द्रोपती वस्त्र सभालो, अब कृष्ण नहीं आएगा —-(1)मानो कैंस दर्ज होजाये, क़ानून की फाइल मे.दस…
हमारी पुरातन संस्कृति का सार है हिंदू नववर्ष
हिन्दू नववर्ष यानी विक्रम संवत 2080 का 22 मार्च बुधवार से शुरू हो रहा है, हिन्दू पंचाग के अनुसार चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नववर्ष की शुरूआत होती है, इस तिथि को नवसंवत्सर भी कहा जाता है।महाराष्ट्र और कोंकण में इसे गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता हैं जिसे बहुत…
आज अंगूठी ढूंढ रही है
जीवन के आमंत्रित सुख अब,निर्मोही दुष्यंत बन गए। मेरे गीतों में शकुंतला आज अंगूठी ढूंढ रही है । मृगछोंनों सी मृदुल फ़ुहारें, झुलसा देतीं हैं हथेलियां, सांसों की बुझती बाती की, तम ने छीनी हैं सहेलियां। मन के काण्वाश्रम में स्मृति क्षण,विरह होम के मंत्र बन गए, तन की समिधा में शकुंतला आज अंगूठी ढूंढ…
आप के महापाप ने बेड़ा गर्क कर दिया।
आप के महापाप ने बेड़ा गर्क कर दिया। स्वर्ग से सुंदर दिल्ली को नर्क कर दिया। अपने ही अपनो के अब खिलाप चल रहे हैं। कि दिल्ली में ही आस्तीन के सांप पल रहे हैं। शराब का खराब झमेला हो गया। दिल्ली में ही ऐसा खेला हो गया। गुरु बाहर देखो अन्दर चेला…
मेरे सरताज ना आएंगे
होली में सब रंग आएंगे,प्यासे तीर उमड़ आएंगे।पर ए रंगों की बारात,मेरे सरताज ना आएंगे। सपनों में रंग डाला तुमको,प्यासी पलकों के काजल से,भिगो दिया भीगी अंखियों ने,अंसुओं के खारे बादल से । इंद्रधनुष कांधों पर रखकर,रंगों के कहार आएंगे ,पर ए सतरंगी बरसात ,मेरे सरताज ना आएंगे। सखियों के अधरों से रह-रह,मधुर मिलन के…
संघर्षशील पथिक हैं महिलाएं.
संघर्ष पथ पर संघर्षशील पथिक हैं महिलाएं…चुनौतियों को स्वीकारती त्वरित निर्णायक हैं महिलाएं।शांत सी नदी की मचलती और कभी कभार उफनती लहरें है महिलाएं…घर परिवार और द्वार की अटूट विश्वास की अनमोल धरोहर हैं महिलाएं….निस्वार्थ भाव और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होती हैं महिलाएं… समस्त महिलाओं को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं पूनम मेहता , ऋषिकेश
दूरियाँ_और_दायरे
जब-जब सिमटती है, एक स्त्री दायरे में। दूरियां बनाती है, वह अपनी कामयाबियों से। देह और प्रजनन के दायरों में सिमटकर , बढ़ती है दूरियां उसकी उपलब्धियों से । एक स्त्री भी जन्मी है ,अपना स्वतंत्र वजूद लेकर। फिर दायरो की सीमा में सदैव क्यों बंधी रही? विवेक व ज्ञान से जिसके वजूद का निर्माण…
