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ग़ज़ल : आशुतोष द्विवेदी

हारी, थकी, उदास निगाहें जाग रहीं, ज़ख्म सो गए मगर कराहें जाग रहीं। अब वे रातें सपनों जैसी लगती हैं, हमें सुलाकर गोरी बाहें जाग रहीं। चिंता करते-करते चिता हो गए हम, राख में अब भी बिखरी चाहें जाग रहीं। बेदम होकर झपकी लेते पाँवों में कब से उलझी-उलझी राहें जाग रहीं। कबके उजड़े उम्मीदों…

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चौड़ाई और गहराई : आरती परीख

लघुकथा डॉक्टर ने कहा — “आपके पास बस छह महीने हैं।” रवि थोड़े दर्द के साथ, पर हल्के से मुस्कुराकर बोला — “छह महीने…? काफी हैं, जीने के लिए….” घर लौटते ही उसने अपनी टू-डू लिस्ट जला दी — वो लिस्ट; जिसमें प्रमोशन, नया घर, कार और सामाजिक प्रतिष्ठा दर्ज़ थी। अब वो हर सुबह…

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सावन में

मिला सानिध्य शिव जी का हमें उपहार सावन में   चले हैं आज मिल सारे लिए मनुहार सावन में।।   सुनो जी आज बम लहरी रही है गूंँज धरती पर।   चली कांँवड़ लिए टोली करे जयकार सावन में।।   बहुत भोले हमारे शिव यही कहते सभी ज्ञानी।   चला जो पास है जाता करें…

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पौरुष पीड़ा,  .…

      *हाॅं मैं भी इंसान हूॅं* हॉं मैं पुरुष हूॅं मान हूॅं मुझे भीसम्मान हे। पौरूष का मुझमें भी निज अभिमान हे ! कठोरबल पराक्रमशक्ति साहस परिपूर्ण । अहंकार है मुझ में गर्व अपनी में आन हूॅं । कठिन हूॅं जटिल हूॅं मान भर ये शान है। करता मैं निजता में भी पूरा अभिमान हूॅं…

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सावन का भोर

(ग़ज़ल) सावन का ऐसा!भोर होते देखा। घनों काआपसीशोर होते देखा। ब्रह्माण्ड की थी ऐसी जगमगाहट। धरा को सुंदरऔर गोर होते देखा।                   सावन का ऐसा।।।।। पवन के झोंके हिलाए वटों को। बारिश का पानी जोर होते देखा।                    सावन का ऐसा।।।।। फूली चमेली है घर पर जो मेरे। उसकोभी मौजे विभोर होते देखा।                     सावन…

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काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती

काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती फिर अन्य रंगों का क्या होता इंद्रधनुष में सात रंगी न होता आसमां नीला न होता और फूल,फल सब बहुरंगी न होते पत्तों का रंग हरा न होता न ही धरती अंतरिक्ष से काली दिखती न ही अंधेरे का कोई सम्राज्य होता। काश हर चीज़ गुलाबी हो जाती गोरी…

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कुंडलियां – अजय कुमार पाण्डेय

बूंद नीर की थी गिरी, भर आए दो नैन मन है कैसा बावला, क्यों होता बेचैन क्यों होता बेचैन, हृदय में पीड़ा होती अधरों पर मुस्कान, नैनों में अश्रु मोती हिय पर्वत को लांघ, लहर थी उठी पीर की दो पलकों के बीच, टिकी थी बूंद नीर की। बिन मौसम बारिश हुई, बादल गरजे खूब…

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मैं भी एक इंसान हूँ, बस पुरुष हूँ

माँ,कभी एक पल को ठहरकर सोचना,तेरा बेटा भी एक इंसान है…हाँ, वो बेटा जिसे तूने बचपन में गिरने से पहले पकड़ लिया था,पर अब जब वो टूट रहा है… तो कोई नहीं देखता। आजकल ज़माना बदल गया है,अब हर पुरुष या तो अपराधी है या अपराधी घोषित कर दिया गया है।समाज में एक ऐसा तबका…

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दो जून की रोटी

दो जून की रोटी जहां में, मिलती सखी सबको नहीं। दिन रात बहता है पसीना, तब हाथ आ पाती कहीं। मँहगाई का आलम ये है,  बढ़ती ही देखो जाती। मजदूरी जितनी भी मिलती, पूरी वह कब हो पाती। जिनपर काम नहीं है कोई, कैसे उनका दिन कटता। दिन में भी तारे दिखते है, मुश्किल से…

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श्यामा

माता-पिता बहुत देखभाल करने के बाद अपनी बेटी का रिश्ता कहीं पर करते हैं। किसी के भी माथे पर यह नहीं लिखा होता कि वह कैसा इंसान है। ऐसे ही श्यामा के मां बाप भी अपनी बेटी के लिए कोई एक अच्छा सा रिश्ता तलाश रहे थे।“अरे भाई कोई अच्छा रिश्ता हो तो बताओ, श्यामा…

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