कविता और कहानी
(लघुकथा) बौद्धिक विकास की कमतरी
ओ यार! क्या तूने सुना कि फलां फ़िल्म के हीरो ने आत्महत्या कर ली !” “हाँ , यार मैं तो देखते ही शॉक्ड हो गया ।” फोन पर बात करते हुए अर्णव अपने मित्र अर्जुन से बोला। “अरे यार! पहले तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ, लगा कि ये फेक न्यूज है, पर यार…
जीवन का आनँद होने न पाए मँद
(कविता मल्होत्रा) दिशाहीन दौड़ मत दौड़ोअपनों का हाथ मत छोड़ो✍️जैसे-जैसे लॉकडाऊन खुलने लगा है, वैसे-वैसे मार-काट, चोरी-डकैती और आपसी भेदभाव के सर्प सर उठाने लगे हैं।कोरोना-काल के इतने बड़े बवंडर के बाद भी लोगों को अराधना का साफ आसमान दिखाई नहीं पड़ रहा है।क्या दीप जला कर मंत्रोच्चारण करने से ही ईश्वर की अराधना संपूर्ण…
आपका ध्यान किधर है?
जी हां जनाब, आपका ध्यान किधर है? शायद कहीं और ही व्यस्त हैं आप, तो चलिए जरा आपका ध्यान आपकी ‘व्यस्तता’ से थोड़ी ‘सैर’ पर ले चलते हैं, आपके स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगी l तो जनाब हुआ यूं कि बड़े बाजार की सबसे बड़ी कपड़ा दुकान के सेठ जी ने बड़ी तेज तर्रारी के…
।। हमारा तंत्र ।।
समाज में राजतंत्र के बाद प्रजातंत्र आया। लेकिन प्रजातंत्र के साथ साथ राजतंत्र भी उसी के समानांतर चलता रहा है। लेकिन समाज को यह दिखता नहीं केवल महसूस होता है।यह राजतंत्र राजाओं से भी क्रुर व्यवस्थाओं में पनपा है ,और पनप रहा है।इस राजतंत्र को आज गुंडातंत्र, आतंकवाद,आदि नामों से कहा जाने लगा है।…
“अपने पराए”
विपत्ति के समय ही मनुष्य के चरित्र की पहचान होती है। कौन अपना है और कौन पराया है, इसका पता मुसीबत में ही लगता है। इस घटना के जो मुख्य पात्र हैं वो आज नहीं हैं। परन्तु घटना से मिली एक सीख आज भी मुझे याद है। दादाजी के गुजर जाने के बाद की घटना…
आज मैं प्रश्नाकुल हूँ ………
आज प्रश्नाकुल हूँ मैं क्योंकि आँखों का आदिम स्वप्न रोता, प्यासे मन में विषाद दिखता जीवंत सत्य बस गरल बोता ! आज प्रश्नाकुल हूँ मैं क्योंकि वृथा दंभ की परिधि फैली अभीष्ट जो था , अपवाद क्यों है ? पक्षपात, वेदना, निशा दृष्टिगत शिराओं में रक्त का संचार ज्यों है ! आज प्रश्नाकुल हूँ मैं…
