कविता और कहानी
पावन गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर
गुरु का ज्ञान ही आदमी का जीवन-पथ,सदा प्रकाशित व प्रशस्त करता रहता है.स्वयं से यहां जब हारने लगता है इंसान,शीघ्र पूज्य गुरुजी का आह्वान करता है. गम का अंधेरा हो या दुख का पहाड़ हो,गुरु की ज्ञान-ज्योति सब दूर कर देता है.गुरू के प्रति सिर्फ क्ष्रद्धाऔर समर्पण हो,ब्रह्मस्वरूप गुरुवर हाथ पकड़ चलाता है. अपनी गुरूभक्ति…
डेढ़ माह का जीवन
कुश्लेन्द्र श्रीवास्तव (वारिष्ट पत्रकार एवं साहित्यकार), गाडरवारा, मध्य प्रदेश अस्पताल के जनरल वार्ड में आई तब उसकी नजर वार्ड के नए पेशेन्ट पर पड़ी थी। बेड नम्बर 8 पर एक दस साल का बालक आँख बंद किए लेटा था पास में ही एक कम उम्र की महिला बैठी थी जिसके चेहरे पर उदासी थी। उसने…
“मूल्यों का अपहरण”
हमारे देश में भ्रष्टाचार का ही चलन है। जो भ्रष्ट नहीं है वो पिछड़ा हुआ है। परिवार, समाज और प्रांत सभी इसकी गिरफ्त में हैं। केवल नेता या अफसर ही नहीं, सामान्य नागरिक भी भ्रष्ट आचरण को अपना चुका है। मर्यादित आचरण से सभी अनभिज्ञ हैं। दुख की बात है कि परिचित होना भी नहीं…
एक गीत चलो गाए
एक गीत चलो गाए जिस संग ज़िंदगी गाए मुसर्रत हो जिसमें इतनी कि मन झुम जाए सिमट दे जो हर ग़मों को इक नगण्य बिंदु में दर्द हो चाहे जितना भी हर कोई भूल जाए एक गीत चलो गाए जिस संग ज़िंदगी गाए। मुरझाईं रुखसारों की हर कलियाँ खिल उठे मौन होंठों पे फिर से…
पत्तों की ताली
अमरैया की छांव तले नन्हे नन्हे ,पांव चले । हरी-भरी, डाली में झूमे बचपन जिसकी ,गोद पले । मीठे फल और ठंडी छांव बरगद वाला, मेरा गांव । लट देखो ,धरती को चूमे मस्ती में वो सर- सर झूमे । ज्यो मतवाली नाव चले अमरैया की छांव तले। नन्हे नन्हे पांव चले। फल हैं जैसे,…
‘प्रवासी मजदूर और बरसात का कहर’-
आज सारे संसार के सामने कोरोना महामारी का प्रकोप पांव पसार खडा़ है, मानव को झंकजोर कर रख दिया है.एक दूसरे की संवेदना शून्य सी जान पडती है. विश्व की सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक ढांचे में अचानक बदलाव आया है, इन सब का शिकार मजदूर वर्ग हुआ है. भारत में प्रवासी मजदूरों के साथ एक…
