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सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या

यशपाल सिंह “यश” जहां अमृत भी संभावित था वहां गरल चुन लिया उन्होंनेजीवन में संघर्ष बढ़ा तो, काम सरल चुन लिया उन्होंने सूख रहे तरुवर जीवन के, पर हरियाली संभावित थीमगर शुष्क उपवन की खातिर, दावानल चुन लिया उन्होंने जीवन के हर दोराहे पर, ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’जब अपनी बारी आई तो, मार्ग विफल चुन…

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कहानी ; तीसरा बेटा

प्रभुदयाल खट्टर जिस मकान में दीनानाथ जी रहते थे वह मकान उनके अपने नाम था। जिसमें दीनानाथ जी अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते थे। हालांकि उनके दो बेटे भी थे मगर दोनों मकान अपना नाम कराने के झगड़े के चलते अपनी अपनी पत्नी को लेकर अलग रहने चले गए थे। यह बात जब दीनानाथ…

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“हम क्या करें”

चुग रहे थे हम गुल हाथ में चुभा कांटा गिरा साजी से फूल    थी  मेरी  ही भूल      हम क्या करें थे खयालों में मशगूल। उठा ज़मीं से धूल चेहरा हो गया धुले-धूल      हम क्या करें। बच कर थे हम चल रहे हौसला से थे हम बढ़ रहे बिछा था पग-पग पर शूल…

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मध्यमवर्गीय

जब जब भी तुम्हें ये लगने लगे मैं तुम्हारे करीब हूँ बात बतला दूँ, इश़्क तो धनवान है मैं बहुत गरीब हूँ । दुनिया घुमाने की ख़्वाहिश पूरी नहीं कर सकता हूँ अटूट वादा कर पूरी ज़िन्दगी बाहों में भर सकता हूँ । तुम्हारे हर छोटे बड़े फैसले में जरूर अपनी राय दूँगा सुबह अलसा…

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साँस हर दिल की थमी-थमी है सहमा-सहमा सा हर आदमी है

कविता मल्होत्रा (स्थायी स्तंभकार-उत्कर्ष मेल, कवियित्री एवं समाजसेवी) आज से तीन महीने पहले कब किसी ने सोचा था कि सरपट भागती जीवन की रफ़्तार अचानक यूँ थम जाएगी कि अगले पल साँस लेने से पहले भी सोचना पड़ेगा और साँस छोड़ने की दशा भी अकल्पनीय हो जाएगी। सच है! परिवर्तन ही संसार का शाश्वत नियम…

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चलो आज कुछ कह लेती हूं

मैं भी अपने अंतर्मन से कुछ बातें चुन लेती हूँ चलो आज कुछ कह लेती हूं। मैं वही हूं जिस मिट्टी ने नूतन आकार लिया है मैं वही हूं जिसके अपनों ने सहर्ष स्वीकार किया है मैं अपने अंतस की गर्मी को आज हवा देती हूं चलो आज कुछ कह लेती हूं। तोड़ने आए थे…

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सच बोलना सख्त मना है

यह रोशनी जिसे तुम अंधेरे के खिलाफ  ‘जागृति’ कह रहे हो वक्त के पिछडेपन को दूर करने की रीत है          भीतर का अंधेरा           अभी डरा रहा है            रह-रहकर उजाले मे            उभरती परछाइयां …            खुली हुई लाशे बन जाती हैं            गाती गांधी का गीत हैं            देखो,            सूरज  का…

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आपस्तम्ब

हे श्रमवीर तुम्हारे कुदाल ने कंटकाकीर्ण मग सुगम किया । एक पैर पर थाम लिये जैसे अम्बर कर्मयोगी सूरज भी देख तुम्हे पिघल गया । ● लज्जित हैं कर्मवंचक अवसरवादी लोलुप तुम्हे देखकर; प्रतिमान तुम्हे मानते जिजीविषक स्वाभिमानी देखते तुम्हे मुड़मुड़कर।। ● तुम्हे देख स्मरण हो आती कृष्ण की कनिष्ठा पर धारित गोवर्धन पर्वत की…

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आंधियों में चिराग जलना…

प्रवीण बहल (विकलांग रत्न) किसने देखा है आंधियों में चिराग जलनाअंधेरों में चराग जलना तो सब ने देखाकौन जला सका आंधियों में चिरागमैं वह इंसान हूं– जो आंधियों में चिराग जलाता हैइन चिरागों में मैंने अपने दिल का खून डाला हैकई बार यह चिराग टिमटिमाते रहे–पर कभी बुझ न सके–मैं दिल से आंधियों में चिराग…

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आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें।

आओ अपने सपनों को एक नया आयाम दें। उजले रंग दें इक नई पहचान दें। बदल रही है दुनिया बड़ी तेजी से तुम भी ऐसे बदलो कि सब अच्छा कहें। आओ अपने सपनों को======= अच्छे संस्कारों से शुद्ध करलें आत्मा को ईश्वर पर एकाग्रता से ध्यान दें। आप जब होंगे पवित्र और प्यार होगा दिल…

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