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विरोध के स्वर

सुनो, विरोध के नवोदित स्वरयह तो कीचड़ उछालना हैअसुरों की प्रवृत्तितुम तो मनुष्य हो नासंक्रमण से बचोशब्दों को पहचानोविरोध विरोध हैकीचड़ कीचड़ है!सुनो, चीरहरण मत करोभरी सभा में सभ्यता कापरनिंदा से पहलेअपने गिरेबान में झाँकोजिस पंथ की आड़ में खड़े होवह धृतराष्ट्र है औरों के लिएतुम तो कर्णधार हो नादुर्योधन मत बनो!सुनो, निकलो वातानुकूलित बैठक…

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पुस्तक समीक्षा मंज़र गवाह हैं

समीक्षक : मुकेश पोपली दुनिया में अनेक तरह के मंज़र हम देखा करते हैं।  कुछ मंज़र ऐसे होते हैं जो हम कभी भी दुबारा नहीं देखना चाहते।  कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें हम बार-बार देखना चाहते हैं।  हमारे जीवन में बहुत बार ऐसा भी होता है कि हम विभिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए कुछ…

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विडम्बना

नहीं सुनना था वो सुनते रहे हैं। हम अपना सर सदा धुनते रहे हैं।। जो पिस्सू की तरह खूँ चूसते हैं। उन्हें ही आजतक चुनते रहे हैं।। मकां बन जाए, रोटी भी मिलेगी। जन्म से बात यह, सुनते रहे हैं।। हमारे जीते जी पूरे न होंगे। हम ऐसे ख़्वाब क्यों बुनते रहे हैं।। हमें तो…

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यथा सत्य

चाहे जो हो सदी है प्रमाणित यही, आस्तीनों में ही साँप पलते रहे। खून भी दूध भी सब पिया है मगर, फिर भी वो तो जहर ही उगलते रहे।। मंथरा थी कुटिल, कैकेई कोमल हृदय, फिर भरा है जहर, कैकेई बस में हुई। राम को वन, भरत को सिंहासन मिले, वो अयोध्या की ही राजमाता…

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बच्चों तुम तक़दीर हो कल के हिंदुस्तान की : कविता मल्होत्रा

इस बार गर्मी की छुट्टियों से पहले ही स्कूल बँद हो गए, और बढ़ी हुई छुट्टियों के साथ ही बच्चों का नानी-दादी के घर पर जाना बँद हो गया, दोस्तों  के साथ बाहर खेलना-कूदना सब बँद हो गया।असमँजस की स्थिति में सभी बच्चे व्याकुल होकर लॉकडाऊन के ख़त्म होने का इँतज़ार कर रहे हैं। पूछे…

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मैं जानता हूं

                            मैं जानता हूंँ                        कि बड़े- बड़े चट्टान                       हो जाते हैं मिट्टी- धूल।                     जब मानुष अपनी आलस,                अपनी नाकामी को जाता है भूल।                     मिल जाता है लक्ष्य उसे                  बन जाता जब है वो कलाम।                जब नहीं भीत होता है काँटों से                 बन जाता है मिसाल का नाम।…

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बातों ही बातों में (लघुकथा)

किस्तूरी आज बहुत चिढी़ हुई थी अपनी पडोसिन कमला  से। उसकी सारी पोलपट्टी खोल दी। वो भी बाल्कनी से। मोहल्ले के सब लोगों ने भी सुन लिया होगा। जब से  लाकडाउन  में थोडी छूट मिली है, सभी अपने घर के बाहर  कुर्सी डालकर चुगलियों का दबा  पिटारा  खोलने लगती हैं। जो उस समय  वहाँ नहीं…

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बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की 2 ग़ज़ल व परिचय

ग़ज़ल 1 हम उसे देख कर गए खिल से आँख में ख़्वाब भी हैं झिलमिल से आपका ख़त मुझे मिला लेकिन हाथ मेरे गए थे कुछ छिल से ख़ुद को उसके हवाले करके मैं दोस्ती कर रहा हूँ क़ातिल से मौत क्या रास उनको आएगी ज़िंदगी से फिरे जो ग़ाफ़िल से दर्द उसका वहाँ भी…

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सुरेश बाबू मिश्रा जी की 2 रचना एवं परिचय

सेक्युलर मिश्रित आबादी वाले इस मुहल्ले का माहौल आज बेहद गर्म था । एक समुदाय के कुछ नौजवानोंने यह टिप्पणी कर दी थी कि पूरे देश में कोरोना का संक्रमण एक खास जमात के लोगों के गैरजिम्मेदाराना बर्ताव के कारण फैला है । यह बात दूसरे समुदाय के लोगों को बहुत नागवार गुजरी । देखते…

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पंचम सिंह पुराणिया (पांचाल) की 2 रचना एवं परिचय

हाय ! बुढ़ापाजरा जोर की गति से, सब अंग हाल बेहाल ।शिथिल हुआ तन फिर भी, मन की चंचल चाल । ।इंद्रिया सभी थकित हो गई, रहती ममद की चाह ।लाठी लेकर बाहर जावे, तब ही चल पावें राह । बधिर यंत्र कानों में हैं, ऐनक नयनन मॉंहि ।नकली बत्तीसी है मुंह में, असली दन्तावली…

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