ग़ज़ल के मिसरे को मिसरे से जोड़ा जाता है
ग़ज़ल के मिसरे को मिसरे से जोड़ा जाता है तमाम रात ग़मों को निचोड़ा जाता है पुराने जाल से बाहर निकलना मुश्किल है इसीलिये तो रवायत को तोड़ा जाता है उतर गये हैं तो अब जीतना ही मंज़िल है कहाँ यू हमसे भी मैदान छोड़ा जाता है उठाना पड़ता है फिर हाथ गर नहीं…
