साहित्यिक आयोजनों में जुगलबंदी का जाल
(अकादमियों और संस्थानों की बंद दुनिया में अपनों का उत्सव) – डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय साहित्यिक परिदृश्य सदैव से विविधता, विचारशीलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है। यह वह क्षेत्र है जहाँ शब्द केवल रचना नहीं होते, बल्कि समाज के अनुभव, संघर्ष, संवेदनाएँ और परिवर्तन की आकांक्षाएँ भी अभिव्यक्त करते हैं। परंतु वर्तमान…
