Latest Updates

दर्द ए आरक्षण (सुनील शर्मा)

लोकतंत्र में राजतंत्र का ही पलड़ा भारी है!
कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!
रोजगार के चक्कर में सड़कों पर युवा भटकते हैं!
जब भी हक की बात करो आंखों के बीच खटकते हैं!!
पढ़ लिख कर जो ख्वाब थे देखें सारे चकनाचूर हुए!
कुछ आरक्षण की चक्की में पीसने को मजबूर हुए!!
राजतंत्र के आगे देखो लोकतंत्र ही हारी है!!
कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!

जाति वर्ग के नाम पर तुमने पूरे देश को बांट दिया!
खंजर भोंका आरक्षण का प्रतिभाओं को काट दिया!!
संविधान ने तो समान अधिकार सभी को बांटा है!
यह आरक्षण प्रगति मार्ग का एक खटकता कांटा है!!
सत्ता के भूखे लोगों की यह सब कारगुजारी है!!!
कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!

ब्राह्मण क्षत्रिय के घर में भी रोटी के फांके होते हैं!
व्याकुल होकर फूट-फूटकर भूखे बच्चे रोते हैं!!
वोट बैंक के इस मुद्दे को खत्म नहीं होने दोगे!
हमें पता है तुम भारत को एक नहीं होने दोगे!!
तुमको मतलब नहीं राष्ट्र से तुमको कुर्सी प्यारी है!!
कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!

यूजीसी बिल लाकर तुमने भाई भाई को बांट दिया!!
स्वर्ण को ही देश में तुमने अलग थलग है छांट दिया!!
तुमने जितना दर्द दिया हम उतने ही मजबूत हुए!!
आजाद हिंद को करने में स्वर्ण ही शेर सपूत हुए!!
अब स्वर्ण वाला लोकतंत्र ही सब सत्ता पर भारी है!!!
कोई भी हो सकता धारी वोटो का व्यापारी है!!

सुनील शर्मा गुरुग्राम हरियाणा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *