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एक दिन सब यहीं छूट जाएगा

यह दुनिया तो है एक सराय यहां कभी कोई आए तो कभी कोई जाए फिर भी लगी है सबको पैसों की हाय हाय यह पैसा भी एक दिन रूठ जाएगा एक दिन सब यहीं छूट जाएगा। चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात सुख दुख तो है एक आनी जानी बात हैवानियत के मोहरों की…

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अंतिम प्रताड़ना

आंचल ने बी.ए. की परीक्षा दी थी। आंचल के माता पिता (रमा व चेतराम )ने उसका विवाह एक छोटे शहर में अमल नाम के लड़के से कर दिया। एक कंपनी में नौकरी करता था।आंचल के ससुराल वालों को मायके के लोगों का आना-जाना बिल्कुल पसंद नहीं था।आंचल कोई भी काम करती थी उसे तायने ही…

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उत्तर प्रदेश को अब पुनः ब्राह्मण मुख्यमंत्री चेहरे की जरूरत !

उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मंथन करने में जुट गया है । मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा ये अब गंभीर विषय बन रहा । बात करें योगी आदित्यनाथ जी के कार्यकाल की तो उनके कार्यप्रणाली से सवर्णों का एक बड़ा वर्ग, ब्राह्मण वर्ग नाराज है । कारण…

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जब कभी

जब कभी महफिल भी रुलाने लगे। तन्हा-तन्हा पल जब सताने लगे।। हमको आवाज देना मगर दिल से तुम। चाहे इसके लिए अब जमाने लगे।। रिश्ते हर रोज बनते हैं मिटते यहां। दिल लगाना यहां बस फसाने लगे।। ग़मों से अगर बात हो अपनी कभी। इन्तहां में भी हम मुस्कुराने लगे।। रंग भरते हैं ख्वाबों में…

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पिता

हो मजदूर हो फेरीवाला हो रिक्शेवाला हो ठेलेवाला हो कारीगर हो दुकानदार हो ऑफिस कर्मी हो नेता हो अभिनेता हो टाटा, बिरला,अम्बानी हो गरीब या मध्यम या अमीर या करोड़पति पिता तो पिता ही होता है सिर्फ बच्चों की मुस्कान के लिये हर मौसम की मार- हो चिलचिलाती धूप, लू, तेज़ बरसात, आंधी, तूफान या…

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जा रहा है कोरोना

जा रहा है कोरोना लेकर कितनों की जान कितनों की बर्बादी ,कितनों का ईमान इतिहास गवाही देगा, उनकी तबाही की गूंजती है जिनके रोने की आवाज खुलने लगे हैं बाजार होने लगी है चहल पहल सुनाई देने लगी गानो की आवाज,पर गूंजती है उनके रोने की आवाज छिन गई है जिनके घरों में रोटियां बुझ…

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उड़ान

जीवन की मुश्किल राहों में थकना न है… सपनों की उड़ान को पंख लगाने है .. हौसले बुलंद करके मंजिल को पाना है … हौंसले बुलंद हो तो पत्थर भी पानी बन जाता …. इरादे मजबूत हो तो पत्थर भी पिघल जाते …. जीवन में कोई भी बाधा आए सभी अपने आप ही हट जाती…

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हर रूह प्रेम की प्यासी है

कविता मल्होत्रा (संरक्षक एवं स्तंभकार – उत्कर्ष मेल) उधार की मिली सब साँसें,हर धड़कन मुक्ति की अभिलाषी है अपनी संवेदनाओं को साग़र कर दें, हर रूह प्रेम की प्यासी है ✍️ अति हर चीज़ की बुरी होती है, बचपन से सुनते आए हैं।मानव जाति से किस तरह के गुनाहों की अति हुई है जिनके परिणाम…

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छाया है पिता

बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। पिता करता नहीं दिखावा कोई आँसू छिपाता अन्तर में अपने। तोड़ता पत्थर दोपहर में भी वो चाहता पूरे हों अपनों के सपने। बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। भगवान का परम आशीर्वाद है पिता जीवन की इक…

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ख़बर से बेख़बर

ग़मों का मारा बेचारा मासूम-सा ये जो दिल है। अरमानों की इसने फिर से सजाई महफ़िल है।। कुहासा-सा  जिंदगी  में आजकल  बहुत है। दूर बादलों में गा रहा कोई प्यारी-सी ग़ज़ल है।। डर  था  जब  समंदर  की लहरों से  इतना। फिर क्यूँ, बना लिया साहिल सहारे घर है।। पाँवों के  छाले  भी  अब  तो पूछते…

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