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हर बार जीतना जरूरी नहीं है

हर बार जीतना जरूरी नहीं है कभी-कभार हार भी जाया करो। सारी बाजियों में दिमाग का काम नहीं होता, कभी दिल भी लगाया करो।। और हमें यूँ  टकटकी लगा कर ना देखते रहा करो। कभी-कभार अपनी पलकों को भी झपकाया करो।। दोस्त, तमाम उम्र किसी का साथ तुम ना दिया करो। नए पंछियों को खुद…

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एलोपैथ का टूटता तिलिस्म, आयुर्वेदिक काढ़ा बना लाईफलाइन !

आयुर्वेदिक संस्था के रूप में पतंजलि आज वर्तमान समय में सर्वाधिक प्रचलित प्रतिष्ठान है जो भारत के एलोपैथ को तगड़ा टक्कर दे रहा । भारत समेत वैश्विक व्यापार और बाजार में पतंजलि आयुर्वेद का  सबसे अग्रणी निर्यातक है । अभी हाल ही में बढ़ते करोना संकट में जहां एक तरफ एलोपैथ से सुसज्जित हाईटेक अस्पतालों…

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लघुकथा “माघी पूर्णिमा”

माघी पूर्णिमा था।युगल बाबू अपनी पत्नी के साथ गंगा नहाने की योजना को साकार करने घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे।धार्मिकता से रोम-रोम में डूबी पत्नी बहुत खुश थी।अपना साड़ी कपड़ा एक झोले में रख याद कर पूजा का सभी सामान अन्य झोले में रख एक तांबा का लौटा खोजने लगी।तभी उनका प्यारा…

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टूटती उम्मीदों की उम्मीद

इतनी वेदना इतनी बेबसी इतनी लाचारी के बाद थोड़ी सी जगने लगी थी देख कम होते तेज़ी से बढ़ रहे आँकड़े, अस्पताल की कम हुई मारामारी ऑक्सीजन की किल्लत से राहत मौत में भी कमी इस तरह टूटती उम्मीदों की उम्मीद लगी थी बंधने अब सुधर जाएंगे हालात पर मानो हालात ने फिर दी चोट…

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जाना कहाँ है जब हर तीर्थ यहाँ है

कविता मल्होत्रा (संरक्षक, स्तंभकार – उत्कर्ष मेल) मौसम ख़ुश्क,हर सू  धुँआ-धुँआ है असामयिक विदाइयाँ,सदी का बयाँ है क्रंदन मुखरित,आज ख़ामोश हर ज़ुबाँ है मानव गंतव्य भ्रमित,नकारात्मकता जवाँ है चंद धड़कनों की तलब में,प्यासा हर रोआँ है ✍️ आज हर तरफ, हर दिल की अशाँति के मुखरित पन्नों पर ओम शाँति के हस्ताक्षर दर्ज़ हो रहे…

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कैसे

कैसे गीत गजल कविता के छंदों का विस्तार करूं । भय से विस्फारित जब आंखें ,कैसे उनसे प्यार करूं ।। घायल मन , निर्बल है तन, चेतना शून्य कुंठित विचार । प्रलयंकारी बाढ़ -वेदना का कैसे प्रतिकार करूं ।। 1 जिसको खुद उपचार चाहिए वह प्रियजन की चिता जलाता। अंधकार है गहन सूझता नहीं किरण…

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अनुत्तरित प्रश्न

आज भारत ही नहीं पूरा विश्व ही इस कोरोना के चपेट  में आया  हुआ है। कितने घरों से तो पूरा परिवार  ही साफ हो गया । कितने लोग ऐसे भी हैं जो मंहगी दवाइयाँ खरीदते खरीदते बर्बाद हो गये, किसी के जेवर बिके तो किसी के मकान और दुकान तक बिक गये वह भी कौड़ियों…

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बिपिन चन्द्र पाल

(Bipin Chandra Pal) (07 नवंबर, 1858 से 20 मई, 1932) प्रारंभिक जीवन :- बिपिन चन्द्र पाल का जन्म 07 नवंबर, 1858 को अविभाजित भारत के हबीबगंज जिले में (अब बांग्लादेश में) पोइल नामक गाँव में एक संपन्न घर में हुआ था। उनके पिता रामचंद्र पाल एक पारसी विद्वान और छोटे ज़मींदार थे। उन्होंने ‘चर्च मिशन…

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मुर्दों का मोहल्ला

हो गया हल्ला जब मिला मुर्दों का मोहल्ला खुले आसमान में गंगा की गोद में सोये हुए प्राणहीन आप के सगे संबंधी।  कौन है? जिम्मेवार! जिन्हें छोड़ कर बालू की रेत में चले जा रहे अपना कर्म पूर्ण कर। बनाकर विविध पंथ, धर्म, पाखण्ड में पड़कर! अपनों को ही चील , कौओं के हवाले कर…

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अभी कोरोना काल ही है।

विगत वर्ष कोकोरोना वर्ष कानाम देकर उससे सम्बन्धित सारे दस्तावेजों कोसहेजकर रखना चाह रहे थेकिआवश्यकता पड़ने परउसे उलट पुलट करउसकी भयावहता की कल्पना कर लेंऔर आगामी किसी प्रकार के वायरल प्रकोपों में उसका तुलनात्मकअध्ययन कर सकें, और वह इतिहास मे अंकित व्यथा गाथा हो जायकि अचानक कोरोना ने पुनःदुगुने चौगुने वेग से साँसें  लेनी शुरु…

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