लक्ष्य करने की बात है कि संघर्ष के इस युग मे जब संघर्ष का कोई बौद्धिक कारण नहीं मिलता तो यही समझ में आता है किहिंसक और कुछ हद तक अहिंसक संघर्ष भी क्रोध स्वार्थऔर संकुचित मानस की उपज है । आध्यात्मिक गुरुओं और जीवनदिशा निर्देशक महापुरुषों ने स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन में “हम” और “वे” जैसी सोचों को समाप्त कर अगर एकात्मता को स्वीकार कर लिया जाए तो यह संघर्ष स्वयमेव समाप्त हो जाए।मानस का संकोच हृदय के उच्चतम विस्तार में परिवर्तित हो जाए।
यह एकात्मता तो भौतिकता के स्तर की बहुत बड़ी चीज है और सम्पूर्ण विश्व का उच्चतम काम्य है। यह मानवता की पराकाष्ठ चिंतन का परिणाम है।किन्तु प्रथमतःवह मानवता जिसकी सम्पूर्ण विश्व दुहाई देता नहीं थकता ; की परिभाषा क्या हो सकती है तथा किस अर्थ मे यह विश्व को काम्य है। ह्यूमैनिटि शब्द का प्रयोग कुछ विचारों , भावनाओं और कृत्यों के लिए कब ,किसके द्वारा और किन संदर्भों में हुआ, प्रसंग को देखते हुए इसे जानना भी उचित प्रतीत होता है।
- पर इसके पूर्व हम यह भी देखना चाहेंगे कि विश्व- सभ्यता के आदिकाल मे इस तथाकथित मानवता का सर्वथा अभाव था या कि प्रकारांतर से मनुष्य के व्यवहारों , सोचों में यह किसी रूप में विद्यमान था? एक युग, जब मानवजाति भोजन आजीविका, निवास और अन्य सुख सुविधाओं की खोज में पूरे विश्व में भटक रही थी , अपने जंगली जीवन से मुक्ति पाने हेतु अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति के बलबूते नये नये स्थानों की खोज करती अर्धविश्व में अपना स्थान बना रही थी,तब सीमाएँ इस तरह आड़े नहीं आती थीं।, वीजा पासपोर्ट की आवश्यकता भी नहीं होती थी। आवश्यकता थी तो बस स्वीकार्यता की।यह स्वीकार्यता जनमानस में होनी चाहिए थी।।इस स्वीकार्यता के लिए वे सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग करते थे। स्वीकार्यता में अगर कोई बाधा थी तो वह थी सांस्कृतिक स्थितियों की, परम्पराओं की, भाषाओं की, वेशभूषा की। ये वाह्य अवरोध थे, जिसे शक्ति प्रयोग से वे हटाना चाहते थे । युद्ध उसका एकमात्र विकल्प था।तदुपरांत ये भावनाएँ धीरे धीरे स्वयमेव शिथिल हो जाती थीं , मानवीय भावनाएँ उभर कर एक दूसरे को करीब ले आती थीं। धीरे धीरे सीमाएँ भी अर्थहीन हो जाती थीं। संस्कृतियों का टकराव एक पृथक मानव संस्कृति को जन्म दे कर आपसी सहनशीलता का परिचय देता था । तीव्र विविधता के मध्य यही एक मानसिक स्थिति थी जो मानवता को प्रश्रय देने में सक्षम थी।इन मिली जुली संस्कृतियों मे एक विशेष मानवीय संस्कृति का विकास सदैव परिपक्वता प्राप्त करता रहा। स्थिति आज भी कुछ विशेष बदली नहीं है सिवा इसके कि आज अपनी सीमाओं के रक्षण के लिए हम विशेष प्रयत्नशील हैं। यह समय और स्थानविशेष के मानव समूह की सुरक्षा के साथ देश की अन्य भौतिक आवश्यकताओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण तो है पर इस कारण मानवता के मूल सिद्धान्तों की अवहेलना भी हो जाती है जो कदापि अभीष्ट नहीं।
प्रश्न है कि आज मानवता शब्द का प्रयोग जिन अर्थों में सम्पूर्ण विश्व करता है वह अगर अंग्रेजी शब्द ह्यूमैनिटी का पर्याय है तो इसका सर्वप्रथम प्रयोग कब और क्यों हुआ।? कहते हैं कि सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग चौदहहवीं शताब्दी में- इटली के उस रिनेसाँके दौरान -एक इतालवी विद्वान कविहृदय फ्रांसेस्को पेट्रार्क
ने किया था । उसे मानवतावाद का जनक भी कहा जाता है।इटली में इस शब्द का प्रयोग उनकी उस जागरुकता का प्रमाण हैजो वैश्विक धरातल पर बहुत बाद में सामने आई जिसके तहत मानव को केन्द्र मे रखकर राष्ट्रीय और सामाजिक सोच को विकसित करने की बात सोची जाने लगी। मनुष्य की ईश्वर प्रदत्त क्षमताओं का विकास,साथ ही उसकी बौद्धिक और रचनात्मक शक्ति के पूर्ण प्रयोग के अधिकार की वकालत की गयी ।मानव जनित प्राचीन साहित्य, इतिहास एवं मानव केन्द्रित अन्य विषयों के पढने पढाने पर बल दिया गया।कालान्तर में—बीसवीं सदी के प्रारम्भ में युरोप और अमेरिका में इस चिन्तन को वर्धित करने वाली संस्थाओं का बहुलता से उदय हुआ जिसके द्वारा मनुष्यों के स्वास्थ्य,उसकी स्वतंत्रता,, सुरक्षा ,वैयक्तिक प्रगति और मानव गरिमा की रक्षा आदि पर चिन्ता केन्द्रित की गयी। यानि कि विश्व की चिन्ताओं मे मानव और उसका मनोविज्ञान प्रधान हो गया । मानव के साथ उसके वे नैतिक मूल्य भी जुड़ गयेजो उसे जीव- संसार में अन्य जीवों से पृथक करते थे साथ ही एक विशिष्ट स्थान भी देते थे।मानव अपने नैतिक मूल्यों के साथ जिन गुणों से निरंतर जुड़ा है, सामाजिक प्रयोगों में वही मानवीयता है । मानवता अपने बृहत्तर रूपों में उसी का वाह्य उद्घोष है।
अब प्रश्न उठता है कि हम भारतीय क्या इसी पश्चिमी मानवता को अपनी सोच का आधार मानते हैं अथवा इन सोचों के पूर्वभी हमारी सनातन सोच में मानवता का अस्तित्व था? हमारे सोच का आधार हमारा वह वैदिक साहित्य है जिसे विश्व का प्राचीनतम साहित्य होने का गौरव प्राप्त है और जिसने मानव चिंतन के संदर्भ में वसुधैव कुटुम्बकम-
- “अयं निजः परोवैति गणना लघुचेतसाम
उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम” की सोच रखी। प्रथम पाद में “अयं निजःपरोवेति के स्थान पर “अयं बन्धुरयं नेति” अंकित है।—-महोपनिषद ,अध्याय 6 श्लोक71 । संभवतः प्रथम पाठ ही प्रचलित और शुद्ध है। साथ हीयज्ञों के आदि अथवा अन्त मे पढ़ा जाने वाला यह शान्तिपाठ भी भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को व्यक्त करनेवाला है कि–
सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्ते सन्तु निरामयः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चित दुखभाग्भवेत्।
भारतीय विचारधारा के ये मूलमंत्र है।
शंकाएँ उठ सकती हैं इस ‘”सर्वे” शब्द में क्या हर प्रकृति ,हर गुण सेजुड़े लोगों का अन्तर्भाव है अथवा केवल वे जिन्हें हम आर्य अथवा श्रेष्ठ जीवनप्रणाली अपनानेवाले से इंगित करते हैं उनका ही समावेश है!वस्तुतः वेद-वेदाँगों का यह विश्वभाव है। यदि मात्र मानवों के संदर्भ मे इसे देखें तो वेदों में मानवों के कर्म के आधार पर जिन चार वर्णों मे उन्हें देखा गया ओर आयु , शारीरिक स्थिति और सामाजिक स्थितियों के मद्देनजर जिन चार आश्रमों की व्यवस्था की गयी,वे सब विश्व के सभी कोटि केसमुदाय के लिए सत्य है।विश्व की आधी जनसंख्या अगर स्त्रियों की है तो वेदोंमें कहीं लिंगजनित भेदभाव कर उनके विकास को बाधित नहीं किया गया बल्कि उनकी मूल प्रवृति और प्रकृति के अनुरूप उन्हे विकास के अवसर मिले । समाज सर्वांगीण विकास के लिए वैवाहिक संस्था जनित व्यवस्था से जोड़कर गृहस्थाश्रम का अभिन्न अँग बनाया और समाज के हर वर्ग के लिएउनके कर्तव्य सुनिश्चित किए।उन्हें अपने आध्यात्मिक उत्थानके प्रयत्नों में समान भागीदारी मिली। यज्ञों में उनकी अनिवार्यता , विदुषियों के रूप में उनकी सामाजिक पहचान,ज्ञान की खोज के लिये दार्शनिकवाद-विवाद में सम्मानजनक भागीदारी मिली। घोषा मैत्रेयी, लोपामुद्रा, गार्गी आदि विशिष्ट नाम भारतीय वैदिक संस्कृति की विशेष पहचान हैं।मूलभूत भावनाएँ यथा दयालुता, करुणा,प्रेम, सहनशीलता,सौहार्द, परोपकार , आदि उमकी जीवनशैली के मानवीय रूप थे। समानता की वह विशेष भावना जो परवर्ती कालों , अथवा यों कहें कि अर्वाचीन चिंतन में सम्पूर्ण विश्व के लिए आदर्श रूप मे प्रस्तुत है,इसका उत्स हमें हमारे वैदिक चिंतन में ही दीखता है।मानवता से जुड़ी यह मानवीयता पर्यावरण के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है।मानवेतर जीवों के प्रति करुणा मानवीयता का विशाल अन्तहीन स्वरूप है।
उचित के लिए ,आदर्श सिद्धांतों के लिए संघर्ष वेदकालीन संस्कृति में भी काम्य है पर मात्र शक्तिप्रदर्शन इसका उद्येश्य नहीं रहा।वैदिक संस्कृति का प्रमुख उद्येश्य मानव प्रकृति की प्राकृतिक शक्तियों को विकसित करना रहा।किन्तु आज सम्पूर्ण विश्व मात्र अपनी श्रेष्ठता एवंसैन्य शक्ति प्रदर्शन के अवसर संघर्षों के माध्यम से ढूँढ रहा है। विश्वशान्ति की भावना से विश्व विजय को हासिल करना तो हमारी संस्कृति की वेदों, बौद्धों और अर्वाचीन चिंतकों की अनवरत चिंतन परम्परा रही है। कायरताप्रदर्शन सेमुक्त तद्जनित चिन्तन भारत के विश्वविजय के मूल शक्तिशाली अस्त्र शस्त्र हैं।
यह भारतवर्ष है।इसके विचारों सनातनता की रक्षा करते हुए गौतम बुद्ध, विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहँस , अरविन्द ,गाँधी आदि ने सम्पूर्ण विश्व को इस वैचारिक दिशा की ओर मोड़ने का प्रयत्न किया है।
मानवता जो मानव का भाववाचक रूप हैऔर मानवीयता दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।मानवीयता मानव स्वरूप की चरित्रात्मक प्रस्तुति हैजो समाज के विश्वजनीन समूह के लिए अत्यधिक कल्याणकारी है और जिससे हीन मनुष्य आसुरी हो जाता है।
आवश्यकता है कि मानव इस संस्कृति को बनाए रखने के लिए सर्वप्रथम स्वयम् से आरम्भ करे।सर्वजनीन सिद्धान्तों को स्वयं पर आरोपित करे।और उसे सर्वकालत्व और सर्वदेशत्व प्रदान करने को सदैव सचेष्ट रहे।
आज के पश्चिमी देशों की मानवता संधर्षों को रोकती नही । मानव हृदय की शान्तिप्रियता की अवहेलना कर उसे उकसाती है।व्यक्ति कल्याण के नाम पर स्वार्थपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार कर भौतिक समृद्धि प्राप्ति हेतु युद्ध का आह्वान करती है। धर्म का विकृत स्वरूप भी उसके मूल में हो सकता है। यह उसी मानवता का हनन करती है जिसकी वकालत भी किया करती है।
भारतीय लोकचिन्तक संस्कृति जो मानवमात्र के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है,विश्व के प्राचीनतम वैचारिक काल की संस्कृति है,और यह कहने मे हमें कोई संकोच नही कि विश्व की श्रेष्ठ मानवता जनित चिन्तन का उत्स भी है।
। आशा सहाय
