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माँ पर लाल बिहारी लाल के कुछ दोहे

माँ जीवन का सार है, माँ है तो संसार। माँ बिन जीवनलालका,समझो है बेकार।1।   माँ की ममता धरा पर, सबसे है अनमोल। माँ जिसने भूला दिया,सब कुछ उसका गोल।2।   माँ सम गुरू नहीं मिले, ढ़ूढ़े इस संसार। गुरु का जो मान रखा,नैया उसका पार।3।   माँ के दूध का करजा,चुका न पाया कोय।…

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पराया घर पराये बोल

शमिता के ससुराल मैं कोहराम मचा हुआ था। जो कोई आता सहानुभूति के साथ-साथ दो टूक शब्द ऐसे कह जाता जो कलेजे को अंदर तक चीर जाते। शमिता के आँख के आँसू तो अब जैसे सूख गये थे, बस मूर्तिवत आने-जाने वालों को देखती रहती। कोई कहता” अरे पहाड़ सी जिंदगी पड़ी है कैसे कटेगी”…

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अशोक मिज़ाज की ग़ज़ल

सुरों की बज़्म सजाओ नहीं तो चुप बैठो, ग़ज़ल के शेर सुनाओ नहीं तो चुप बैठो। है कौन चोर इधर  कौन चौकीदार इधर, उन्हें पकड़ के बताओ नहीं तो चुप बैठो। मज़ा खराब करो मत फ़िज़ूल बातों से, ज़रा सी और पिलाओ नहीं तो चुप बैठो। चले तो आये हो तुम भी हुनर की महफ़िल…

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यूँ तो बहुत सी चीज़ें अच्छी लगती हैं,

यूँ तो बहुत सी चीज़ें अच्छी लगती हैं, उसे अच्छा लगते रहने को बरक़रार रखने के लिए भी, बहुत सी चीजों का साथ चाहिए जैसे- मौसम का साथ,मिज़ाज का साथ,साथियों का साथ,माहौल , तालुक्कात,रवायत और दिल में ढेर सारा प्यार और जज़्बा……… आसान तो नहीं सब कुछ पा लेना आसान बनाना पड़ता है कभी अन्दाज़…

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संकल्प

दीपू ज्यादातर विद्यालय में देरी से ही पहुँचता था । देर से आने वाले बच्चों की अलग लाइन बनवाई जाती है तथा उनका नाम भी उनकी कक्षा के अनुसार लिखा जाता है ताकि उनके कक्षाध्यापक उन्हें जान सकें और समझा सकें । उस रजिस्टर में नवीं कक्षा में पढ़ने वाले दीपू का नाम एकाध दिन…

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दैर-ओ-हरम में रहने वाले तू जाने क्या पीर मेरी

दैर-ओ-हरम में रहने वाले तू जाने क्या पीर मेरी जरा निकल तो दिखलाऊंगा कैसी है तदबीर मेरी दैर-ओ-हरम में………. तुझको ढूंढा सहरा-सहरा, तुझको खोजा गली-गली कहीं मिला ना तू ऐ मालिक पत्थर की सी बूत ही मिली कैसे हाल सुनाता तुझको ऐ पत्थर दिल ओ रे पीर तुझसे तो अच्छा है बालक सुनता है तहरीर…

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मेरी माँ

पुनीता शुक्ला अगर तुम न होती न होते हम तुम्हारे वजूद से ही बने हैं हम न होती ये सांसे, न होता ये दिल, न दिल कि ये धड़कन न होते हम अगर तुम न होती ——- अपनी दुवाएं और ये आँचल आँचल में लिप्त हुआ ये प्यार न छोड़ देन इसे कभी, विनती करूँ…

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जीवन का सच

अजीब है दुनिया वालों का बड़प्पन, अपने अपने ना रह जाते, कुछ गैर अपने हो जाते, मुश्किल तो तब होता है, सामने प्रेम जताते हैं और पीछे से, साजिशों के पुल बांधते हैं। जुस्तजू जिंदगी की, बस यही कहना बाकी रह गया कहते है संस्कार जिसे, उसे भी बखूबी छला गया। प्रेम कैसा श्रृंगार कैसा,…

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चतुराई काम ना आयी

राजीव के सब्जी मंडी में आते ही अचानक सब्जी बेचने वालों के बीच में खलबली मच गई।काफी समय से राजीव सब्जी मंडी आता है और हर सब्जी खरीदने में कुछ ना कुछ बहस बाजी करता ही रहता है।          उसे देखकर अब सब्जी वाले समझ गए हैं कि इसे कितने भी रेट बता दो वह…

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मैं क्या बोलूं

मैं क्या बोलूं दिल है व्याकुल, बच्चों की देख‌कर विकल दशा। ताला है लगा जुबां पर जैसे, लगभग दो सौ बच्चों को खोया है। मां की आंखों के बहते सागर में मेरे शब्द कहीं बह जाते हैं। खाई गहरी निर्धन व धनिक मध्य, मन जार जार कर रोता है । कुछ के पानी तक आते…

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