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फूहड़ कंटेंट, सोशल मीडिया और संस्कृति: जिम्मेदारी किसकी?

– डॉ. प्रियंका सौरभ डिजिटल युग ने हमारे समाज की संरचना, सोच और अभिव्यक्ति के तरीकों को गहराई से बदल दिया है। आज मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से कोई भी व्यक्ति कुछ ही सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है—जहां पहले मनोरंजन और…

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बरसो पहले फागुन बीत गया…..अब बुरा मान जाओ 

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  वैश्विक  युद्ध में मेरा पक्ष बस इसी बात से तय होगा कि टीएमसी  किस पक्ष में खड़ी हैं। अगर आज ममता दीदी  कह दें कि वो ईरान खामनेई गैंग से साहनुभूति अनुभूति और ताल्लुक रखती है तो कसम युसूफ पठान कि मैं कल ही फेसबूकिया कामरेड…

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खाड़ी का सामान्य जीवन और मीडिया की युद्ध-छाया”

— एक प्रवासी भारतीय (NRI) की नज़र से पिछले कुछ दिनों से भारतीय टीवी चैनलों और मीडिया पर खाड़ी देशों को लेकर लगातार तनाव और युद्ध की आशंकाओं से जुड़ी खबरें दिखाई जा रही हैं। तेज़ संगीत, लाल पट्टियों में चमकती “ब्रेकिंग न्यूज़” और बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ—इन सबके बीच ऐसा माहौल बन जाता है मानो पूरा…

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कटौती की मार कर्मचारियों पर, विधायकों के बढ़ते भत्ते

(जब कर्मचारियों की आर्थिक सुविधाएँ घटती दिखाई दें और दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के भत्ते और पेंशन बढ़ते रहें, तब स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के संतुलन और न्याय पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं।) — डॉ. सत्यवान सौरभ हाल के समय में सरकारी कर्मचारियों के बीच एक निर्णय को लेकर व्यापक चर्चा और असंतोष देखा जा…

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मानवता और भारतीय संस्कृति

लक्ष्य करने की बात है कि  संघर्ष के इस युग मे जब संघर्ष का कोई बौद्धिक कारण नहीं मिलता तो यही समझ में आता है किहिंसक और कुछ हद तक अहिंसक संघर्ष भी क्रोध स्वार्थऔर संकुचित मानस की उपज है । आध्यात्मिक गुरुओं और जीवनदिशा निर्देशक महापुरुषों ने स्पष्ट करना चाहा है कि जीवन में…

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सबको सन्मती दे भगवान : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

गैस की हाहाकार सच्ची में या केवल अफवाह ? अब इस प्रश्न का उत्तर खोजा जा रहा है । जिनको खोजना है वे खोज ही रहे हैं पर आम व्यक्ति परेशान है । रसोई गैस अब आम इंसान के लिए हवा-पानी की भांति ही जरूरी हो चुकी है । रोटी खाना है तो पकाओगे काहे…

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सपने और संघर्ष

डॉ विजय गर्ग  मनुष्य के जीवन में सपनों का बहुत महत्व होता है। सपने हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और जीवन को एक दिशा प्रदान करते हैं। लेकिन केवल सपने देखना ही पर्याप्त नहीं होता; उन्हें साकार करने के लिए संघर्ष, मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है। वास्तव में, सपने और संघर्ष…

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बुजुर्गों की उपेक्षा और सुरक्षा का सवाल

डॉ विजय गर्ग  समाज की सभ्यता और संवेदनशीलता का सबसे सटीक पैमाना यह है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिन्होंने जीवन भर परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दिया, वही लोग आज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर उपेक्षा, अकेलेपन और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। बदलती…

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क्लिक के दलदल में फँसा समाज: गालियों से ग्रोथ, शोर से शोहरत

(जहाँ सच सन्नाटा है, तमाशा उत्सव है — क्लिक की संस्कृति में खोता हुआ समाज और डिजिटल मंच पर किनारे पड़ा विवेक) डॉ. सत्यवान सौरभ डिजिटल दुनिया कभी ज्ञान, संवाद और रचनात्मकता की प्रयोगशाला मानी जाती थी। यह विश्वास था कि इंटरनेट लोकतंत्र को मज़बूत करेगा, हाशिये पर खड़े लोगों को आवाज़ देगा और असली…

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विदेश भेजने की होड़ और बदलती मानसिकता

( क्या सचमुच भारत में अवसर कम हैं या हम एक भ्रम में जी रहे हैं?)  – डॉ. प्रियंका सौरभ पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज में एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है—बेटे-बेटियों को विदेश भेजने की होड़। कभी पढ़ाई के नाम पर, कभी नौकरी के नाम पर, तो कभी बेहतर जीवन के सपने…

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