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हम कहां आ गये हैं, यूं ही साथ चलते चलते’

सम्पादकीय : मनमोहन शर्मा ‘शरण’ आप सभी को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) की हार्दिक बधाई  एवं अनन्त शुभकामनाएं ।  जीवन जीने का, स्वस्थ रहने का स्वआनन्द से परमानन्द तक की प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाले भारत देश, जिसको पुन: विश्वगुरु बनाने का स्वप्न देखा जा रहा है ।  ऐसा हो तो सकता है किन्तु…

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विरोध प्रदर्शन का बेहद घटिया तरीका !

पहले कानपुर फिर  प्रयागराज और अब मुरादाबाद  में पत्थर  चले ,जबकि कानपुर में हुए पत्थरबाजी को लेकर उत्तर प्रदेश प्रशासन ने जिस प्रकार कार्रवाई की है एक उदाहरण हो सकता है कानून व्यवस्था में शांति स्थापना का। लेकिन इसके बावजूद भी उन्मादियों में कोई सबक नहीं है। तब जब पूरे देश में योगी जी के…

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अपनों की ही नजरबंदी

राजनीतिक सफरनामा (कुशलेन्द्र श्रीवास्तव) विधायकों को मौज-मस्ती करा दी गई है पर नहीं उनकी घेराबंदी कराई गई । क्या समय आ गया राजनीतिक दलों को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं रहा ।  चाहे जब उन्हें घेर कर बंद कर दिया जाता है । विधायकों का भी जमीर नहीं जागता कि वे कह सकें कि…

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“एहसास चाँद के” काव्यसंग्रह  की समीक्षा

समीक्षक:- कमल कांत शर्माएहसासों  को जीवन की सफलता के मामले में  एक बड़ा मानक माना गया है, और जब अपनें दूर जाकर रहने लगते है तो इन एहसासों को सहेजने, संभालने की और भी ज्यादा  आवश्यकता  महसूस की जाती है।  मधुर रिश्तों के लिए सबसे जरूरी होता है, आपसी सामंजस्य और समर्पण का भाव, और जब…

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सम्मान की धज्जियां उड़ाता लूटतंत्र !

खुला समाज कभी खुला नही होता, रैपर में बंद होता है। पैक्डनेस ही ओपन सोसाइटी है , अपनी पॉलिटिक्स है अपना रहन सहन है ।ओपन सोसाइटी में अभिव्यक्ति का खुलापन किसी मुखौटे को लगा कर ही पाया जाता है ताजा उदाहरण विधानसभा में अखिलेश यादव जी है । मुखौटा लगाने और उसे ही वास्तविक चरित्र…

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जन भागिदारी के बिना पर्यावरण संरक्षण असंभव  है

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष (5 जून,) जन भागिदारी के बिना पर्यावरण संरक्षण असंभव  है लाल बिहारी लाल नई दिल्ली । जब इस श्रृष्टि का  निर्माण हुआ तो इसे संचालित करने के लिए जीवों एवं निर्जीवों का एक सामंजस्य  स्थापित करने के लिए जीवों एवं निर्जीवों के बीच एक परस्पर संबंध का रुप प्रकृति ने…

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तू चल मैं आया ! : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

राजनीतिक सफरनामा                                                                          चलो कपिल सिब्बल भी चल दिए दूसरे घर की ओर उन्हें राज्यसभा मेें जो जाना था । कुर्सी चाहिए जहां मिल जाए । नेता तो रमता जोगी बहता पानी जैसा होता है । आज यहां कल कहां उसे खुद ही नहीं मालूम होता । कुर्सी चाहिए, वे बगैर कुर्सी के नहीं रह सकते…

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पर्यावरण सुरक्षित रहे यदि मानव मन लक्षित रहे

कविता मल्होत्रा (संरक्षक, स्थायी स्तंभकार) भला चारित्रिक गठन अनुवांशिक कहाँ होता है अनासक्त प्रेम जहाँ पर्यावरण सुरक्षित वहाँ होता है ✍️ विश्व का असीम और निःशुल्क पुस्तकालय मानव मन में ही विद्यमान है, जो हर किसी को अपने मन का अध्ययन करने में सहायक होता है। लेकिन इस पुस्तकालय तक पहुँचने का न तो कोई…

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