Special Article
अस्पताल से जिन्दा कैसे लौटे
“बीमारी से बड़ी बन चुकी है इलाज की लूट” आज अस्पताल जीवनदान से ज़्यादा भय और लूट का केंद्र बन गए हैं। नॉर्मल केस को वेंटिलेटर तक पहुँचाना, अनावश्यक टेस्ट कराना और दवा कंपनियों से कमीशन लेना आम हो गया है। मरीज और परिजन मानसिक, आर्थिक और शारीरिक कष्ट झेलते हैं। डॉक्टरों की छवि भगवान…
जवान बच्चों की शादी में अभिभावकों की सहमति : परंपरा, अधिकार और सामाजिक संतुलन
दादा गौतम उर्फ़ हरियाणा के विधायक रामकुमार गौतम द्वारा विधानसभा में उठाया गया मुद्दा केवल विवाह की सहमति भर का नहीं, बल्कि समाज की दिशा और संस्कृति के संरक्षण का संकेत है। अभिभावकों की सहमति से विवाह संस्था मजबूत रहती है, जबकि युवाओं की स्वतंत्रता से समाज प्रगतिशील बनता है। चुनौती यह है कि दोनों…
सुधार : सरकारी स्कूलों के बच्चों को ही सरकारी नौकरी में लाइये…..!
पंकज सीबी मिश्रा / राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी यह सितंबर माह शिक्षक दिवस के लिए जाना जाता है। किन्तु वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का जो हाल है वह बेहद दयनीय और चिंताजनक है। पहले तो उन सभी शिक्षकों के प्रति आभार प्रकट करता हूँ जो आज भी स्वयं सरकारी मास्टर है, अस्सी हजार के…
सोशल मीडिया के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश
ये सवाल अक्सर मन में आता है कि 21 वीं सदी में सोशल मीडिया पर जो कंटेंट की बाढ़-सी आई हुई है, उस कंटेंट को विनियमित करने के सुप्रीम कोर्ट के कदम का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर क्या असर होगा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन रोकने के लिए दिशानिर्देश कौन बनाएगा? इस विषय में संविधान…
वोटर अधिकार यात्रा से गरमाई बिहार की राजनीति
राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव बिहार के चुनाव भले ही अभी घोषित नहीं किए गए हें पर बिहार में माहौल चुनावी रंग में ढल चुका है । चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट संशोधन से जागी राजनीतिक पार्टियां अब इसके सहारे ही वैतरणी पार करने की मानसिकता बना चुकी हैं । वैसे तो चुनाव आयोग के…
चीनी, मजबूरी या जरूरी
देश-दुनिया में जिस हिसाब से मधुमेह (शुगर) के रोगियों की तादात बढ़ती जा रही है, उसने यह सोचने के लिए विवश कर दिया है कि चीनी मजबूरी है या जरूरी है। यह तो बात हुई एक खाद्य पदार्थ की और दूसरा मसला है पड़ोसी देश चीन का, उसके उत्पादों और आदमदियों को भी हम चीनी…
हालात की सौग़ात : आरती परीख
बिमल खिड़की के पास बैठा बाहर झाँक रहा था। हवा धीरे-धीरे परदों से खेल रही थी। आसमान पर बिखरे बादल धूप को ढक रहे थे, जैसे कोई अनकही चुप्पी घर पर फैल गई हो। लेकिन बिमल का मन इस चुप्पी से ज़्यादा भारी था— कल रात से भीतर उमड़ा तूफ़ान अब भी थमा नहीं था।…
रजिस्टर्ड पोस्ट का अंत : भरोसे की वह मुहर अब नहीं रहेगी
विजय गर्ग डाकिए की साइकिल की घंटी, थैले से झाँकते पत्रों की उत्सुक प्रतीक्षा, और रजिस्टर्ड डाक की पावती पर हस्ताक्षर का रोमांच – ये पल भारतीयों के दिलों में एक युग की तरह अमर हैं। लेकिन अब यह युग समाप्त होने जा रहा है। भारतीय डाक विभाग ने 1 सितंबर, 2025 से अपनी 50…
स्वतंत्रता का अधूरा आलाप
आज़ादी केवल तिथि नहीं, एक निरंतर संघर्ष है। यह सिर्फ़ झंडा फहराने का अधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक को समान अवसर और सम्मान देने की जिम्मेदारी है। जब तक यह जिम्मेदारी पूरी नहीं होती, हमारी स्वतंत्रता अधूरी है।” — डॉ. प्रियंका सौरभ 15 अगस्त 1947 को हमने विदेशी शासन की बेड़ियों को तोड़ दिया था।…
