Latest Updates

“पांव ज़मीन पर निगाह आसमान पर” लेख संग्रह का भव्य लोकार्पण

वरिष्ठ लेखिका सविता चड्ढा के सद्य: प्रकाशित लेख संग्रह   “पांव ज़मीन पर निगाह आसमान पर”  का भव्य लोकार्पण पंजाब केसरी सभागार में पंजाब केसरी की चेयरपर्सन किरण चोपड़ा द्वारा किया गया।इस अवसर पर दिल्ली एवं दिल्ली से  दूर स्थानों से लेखक ,साहित्यकार शामिल हुए। इस अवसर पर अश्वनी कुमार, स्वामी, संपादक और श्रेष्ठ पत्रकार  पंजाब केसरी ने पधारकर कार्यक्रम को गरिमा प्रदान…

Read More

दीया

मिट्टी ढ़ो ढ़ो कांधे-सिर भार कुम्हार का जुटा परिवार ; गढ़ेंगे दिया भरूकी चाक पर खभारू यापन जीवन संसार! ⭐ रौशनी दूर से टिमटिम झांके अनुरागी आगत को मनाने, हांथ बांध कमर कस तैयार जीवन अंधस तिमिर भगाने! ⭐ फोड़ती माटी का ढ़ेला उदह पानी माटी फुला रही, पैरों से रौंद रौंद कर वह गारा…

Read More

रिश्ता

जिंदगी की राह कुछ ऐसी ही होती जब बेटी का विवाह हो नजदीक पिता की आँखे डबडबाई  रहती मानों आँसुओं का बाँध टूट रहा हो बचपन से पाला पोसा  वो अब घर छोड़ कर जाना होता है  r ये नियम तो है ही किंतु त्यौहार और घर का सूनापन भर जाता आँसू बेटी के न…

Read More

उम्मीदों का वृक्ष

उम्मीदों की चादर में कई सपने दफ्न हो गए। जिन वृक्षो से की थी छाया की उम्मीदे,वो छाया पतझड़ आने पर खुद ही कहीं गायब हो गयी।। जीवन के गुजरते पलो में अक्सर ऐसा हुआ। शुखे मुरझाये वृक्षो से भी कई बार ठंडी हवाओं का अनुभव हुआ , शायद गिर रहे थे जो पत्ते उन्होंने…

Read More

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार बन गया शिष्टाचार भुखमरी-गरीबी का गरम बाजार सरकारी योजनाओं का व्यापार लालफीताशाही का अत्याचार जनतंत्र बन गया आज मजाक, संसद में जा बैठे चोर हजार कुर्सी की खींचतान में नेताओं ने प्यारे भारत की अवाम दी मार हे! सुभाष,भगत, बिस्मिल, असफाक कब होगा भारत भू पर सच्चा उजियार फैला साम्राज्य पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय…

Read More

दीपावली की शुभकामनाएँ”

कविता मल्होत्रा (संरक्षक उत्कर्ष मेल) बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक विजयादशमी का त्योहार समूचे भारतवर्ष में बड़ी धूमधाम से मनाया गया। लेकिन सदियों से रावण वध की रस्में पूरी करता ये समाज आज तक रामराज्य लौटा लाने में सफल नहीं हो पाया। हम सभी जानते हैं कि एक हृदय से दूसरे हृदय तक…

Read More

मगर….

खफा हो गए मुझसे मेरे ही शब्द बहुत सोचा मगर कुछ लिख पाया नहीं। एक नगमा था जो गाती थी कभी मैं आज बहुत सोचा मगर याद कुछ आया नहीं। ये जो बदली थी न ये कल भी थी बरसी बहुत टूटकर मगर मेरे मन को भिगाया नहीं। ये जो राह गुजर रही है आना…

Read More

बूढ़ा-बुजुर्ग जब वृद्धाश्रम में बस जाता है

सिर पर बोझ जब भीअसह्य हो जाता है, आदमी तुरंत  उसे उतार कर रख देता है. इस भरी  दुनिया में  सिर्फ माता-पिता ही, संतान की जिम्मेवारी जीवन भर ढोता है. फूल समान लगता है सबों का बोझ उसे, माँ-बाप  मुस्कुराकर उसे उठाता रहता है. खुद के बुढ़ापा का बोझ  भूल  जाता वह, गदहे की तरह…

Read More

एक खुशी यह भी

हल्की हल्की बारिश हो रही थी और हवा भी सर्द थी । रजाई में ही बैठे बैठे थोड़ी सी गर्म चाय मिल जाती तो कितना अच्छा होता पर नहीं ऐसा नहीं हो सकता था। घर में गहमागहमी का मौसम पसरा पड़ा था क्योंकी दादी जी की हालत ख़राब थी । कुछ समय बाद उनको नीचे…

Read More

एक सौ पचासवीं जयन्ती पर

एक सौ पचासवीं जयन्ती मना रहा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की, पक्ष/विपक्ष मित्र/शत्रु सभी दिखते हैं गांधी के विचारों पर एकमत, आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार/ शिक्षाएँ, तभी तो हुनर को मिलने लगा सम्मान स्वच्छता मन/तन की घर/बाहर/आसपास की ईमानदारी की शर्त अपने लिए सबसे पहले यही तो कहते रहे सदा, सुना/पढ़ा सब लोगों…

Read More