कविता और कहानी
खुशी हो या गम नशा का सेवन क्यों
पर्व-त्योहारों या गम को दूर करने के लिए अथवा विभिन्न सामाजिक पार्टीयों में विशेषकर फब पार्टीयों में नशीली पदार्थो जैसे शराब सिगरेट आदि का प्रचलन बढ़ रहा है और इसे बुराई के तौर पर देखने की प्रवृत्ति प्रायः कमजोर हुई है।नतीजा, युवा वर्ग इस ओर ज्यादा आकर्षित हुए हैं जो एक सभ्य समाज के निर्माण…
डॉक्टर प्रीतम कहिन
वर्ग उनके प्रवचन सुनकर भक्त ने पूछा आप इससे पूर्व ज्यामितिके अध्यापक थे क्या? क्यों की आप वर्ग की बातें करते थे और अब अपवर्ग की त्रिभूज रसिक की पत्नी को प्रेम के त्रिकोण का पता चला तो इस त्रिभुूज को भलि-भलि-भांति बांच के अपने अनुकूल कर लिया, भुजाएं खीच खांच के सलूक…
जिसमें शामिल ज़मीं की धूल नहीं वो बुलंदी हमें क़ुबूल नहीं
जिसमें शामिल ज़मीं की धूल नहीं वो बुलंदी हमें क़ुबूल नहीं तीरगी बादलों की साजिश है चाँद की इसमें कोई भूल नहीं मुझपे तारी जमूद बरसों से एक मिसरे का भी नुज़ूल नहीं तू मुझे जब भी चाहे ठुकरा दे देख इतनी भी मैं फ़िज़ूल नहीं ग़म समेटे है सारी दुनिया का दिल हमारा मगर…
जीवन क्रिकेट खेल
अनिश्चितता मूल में जीवन क्रिकेट खेल फाइनल उनके बीच में जो करते थे ट्रेल जो करते थे ट्रेल, लीग टेबल में नीचे अब वो सब से आगे, और सब उनके पीछे ‘यश’ मत होय निराश तू , व्यर्थ लगा कर होड़ जीवन लंबी रेस है, बस तू केवल दौड़ और जिन्होंने लीग तक, किया विश्वकप…
“मां का फैसला”
मां को सोया जान कर बड़ी बहू नीनू ने अपने पति कपिल समझाते हुए कहा अजी सुनते हो । आज निखिल ( छोटे देवर) का फोन आया था मां के पास अपने साथ रहने की बात कर रहा था। लेकिन आप मां को जाने मत देना जी ,समझ रहे हो ना क्या कह रही हूं?…
कर लें एक मुट्ठी राख को महकाने की तैयारी”
चाह मिटे चिंता मिटे मन हो बेपरवाह जिसे कुछ नहीं चाहिए वही शहनशाह d आज की प्रबुद्ध पीढ़ी हो युवा पीढ़ी हो या शैशवकाल में पल रहा बचपन, शायद ही कोई एैसा इँसान होगा जिसने कबीर जी की वाणी को न पढ़ा हो। ये भी सच है कि एैसे भी कुछ विरले ही इँसान होंगे…
इंसान को इंसान समझो तो बात बनेगी
इंसान को इंसान समझो तो बात बनेगी अच्छे संस्कार व्यवहार में लाओ तो बात बनेगी। दूसरों के दोष खोजने में ना लगा दो जिंदगी कुछ अपनी तरफ देखो तो बात बनेगी। सिर्फ थियोरी में ही ना अटके रहो कुछ प्रैक्टिकल हो तो बात बनेगी । किसी का किसी से कोई झगड़ा ही नहीं एक दूसरे…
नदी की व्यथा
नदी की व्यथा मैं नदी हूं बहती अनवरत, देती हूं जीवन सभी को । राह के चट्टानों को तोड़ती, बढ़ती ही रहती मैं सतत। सदियों से मेरे संग संग ही, इंसा विकास पथ पर डोला। आकांक्षाओं के अपने नीचे, सबकुछ तुम फिर भूल गये। मेरी ही धारा को मोड़ा फिर, मुझको ही बन्धन में बांधा…
आपका दिन
“मैं केक नहीं काटूँगी।” उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदिन मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर की तरह ताज्जुब से उसके चेहरे पर स्थित हो गयीं थी। वह सहज स्वर में…
