“राजनीति के बीज”
इंसान अपना मूल धर्म, इंसानियत खो रहा है। जातिवाद का जहर रगों में सरपट दौड़ रहा है।। खुलम-खुला व्याभिचार और सब कुछ तो हो रहा है। फिर भी, आजकल सुन रहा हूँ के “विकास” हो रहा है।। अब तो राष्ट्रवाद को विचारधारा की गर्म और तेज आंच पर पकाया जा रहा है। मीडिया ट्रायल में…
