आपस्तम्ब
हे श्रमवीर तुम्हारे कुदाल ने कंटकाकीर्ण मग सुगम किया । एक पैर पर थाम लिये जैसे अम्बर कर्मयोगी सूरज भी देख तुम्हे पिघल गया । ● लज्जित हैं कर्मवंचक अवसरवादी लोलुप तुम्हे देखकर; प्रतिमान तुम्हे मानते जिजीविषक स्वाभिमानी देखते तुम्हे मुड़मुड़कर।। ● तुम्हे देख स्मरण हो आती कृष्ण की कनिष्ठा पर धारित गोवर्धन पर्वत की…
