भाषा तभी बड़ी बनती है
अज्ञानी था मानव आदिम सीखा प्रकृति से जीवन जीना रहना गाना पशु पक्षी सम उनकी भाषा में बतियाना जैसी हुई पहचान स्वरों की विविध प्राणियों तरु पत्तों की गगन गरज की,वायु सरण की सरित प्रवाह,जल थल औ नभ की वैसी ही ध्वनियों की रचना अभिव्यक्ति के लिए किया फिर अंतर्ध्वनि विभिन्न भावों की उसी रूप…
