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राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन

(01 अगस्त, 1882 से 01 जुलाई, 1962) प्रारंभिक जीवन :- पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म 01 अगस्त, 1882 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा वहीं के सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल में हुई। सन् 1894 में उन्होंने इसी स्कूल से मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण…

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कमल में कीचड़

कमल कीचड़ में ही खिलता है, जब भाजपा अस्तित्व में आई, अपने चुनाव चिन्ह’कमल’को लेबढ़ चढ़ कर यही दावा करती रहीहम अब तक व्याप्त राजनीति के दलदल में,कीचड़ में,कमल की तरह ऊपर है, अलग है, पार्टी विदए डिफरेंस है बस कुछ समय तकऐसा आभास कराया, जब दो सेचौरासी ,फिर एक सौ बियासी, दो सौ बहत्तर…

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लेखक श्री लीलाराम वर्मा होंगे सम्मानित

अनुराधा प्रकाशन ,नई दिल्ली के बैनर तले मार्च 2024 में वर्तमान के ज्वंलत समाजिक मुद्दे बाल यौन शोषण पर प्रकाशित तथा लेखक श्री लीलाराम वर्मा द्वारा लिखित पुस्तक बाल यौन शोषण : दुनिया के माथे पर कलंक एक बेहतरीन पुस्तक है, जिसमें लेखक ने बाल यौनशोषण/उत्पीड़न से संबंधित सभी पहलुओं जैसे इसके कारण, सामाजिक भूमिका,बच्चों…

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पौरुष पीड़ा,  .…

      *हाॅं मैं भी इंसान हूॅं* हॉं मैं पुरुष हूॅं मान हूॅं मुझे भीसम्मान हे। पौरूष का मुझमें भी निज अभिमान हे ! कठोरबल पराक्रमशक्ति साहस परिपूर्ण । अहंकार है मुझ में गर्व अपनी में आन हूॅं । कठिन हूॅं जटिल हूॅं मान भर ये शान है। करता मैं निजता में भी पूरा अभिमान हूॅं…

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न्यायालय की गरिमा और लोकतंत्र की परीक्षा

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, विधि के शासन और राज्य की जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। जब कोई नागरिक न्यायालय की चौखट पर पहुंचता है, तो वह केवल अपने विवाद का समाधान नहीं चाहता, बल्कि उसे इस बात का भरोसा भी होता है कि उसकी…

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महिमा निज भाषा जिन जानी (हिंदी दिवस विशेष)

अंजू मल्होत्रा, (नॉएडा) महिमा निज भाषा जिन जानी तिन को  मानो सच्चा ज्ञानी। संतप्त ह्रदय शीतल हो जाए सूर तुलसी सा जो लिख पाएँ। प्रिय है हिन्दी का हर एक छंद जन्म -जन्म  का   ये अनुबंध। उगता सूरज दे ये ही गवाही हिन्दी पथ के हम हैं  राही।

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कभी मौन भी : पूनम पाठक

कभी मौन भी हो सकता है बेअसरभले स्वर अनोखा भाषा अलगमौन रहकर भी देखा है कभीक्योंकि इसकी प्रज्ञा प्रखरआंखों की भी जुबां होती हैफिर भी मौनी पर होता प्रहारकब तक मौन रह सकता है कोईभला आधुनिक दुनिया मेंपल-पल सहता रहे कष्टमहसूस ना हो किसी को तनिकआखिर कब तक ऐसा करे कोईमौन रहने पर दिल टूटता…

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ज़िन्दगी के रंग

ज़िन्दगी एक पहेली सी लगती है, दुखो की छाव एक सहेली सी लगती है । हम तो बैठे थे इक आशा की किरण थामे पर अब आशा करना एक नादानी सी लगती है । ज़ख्म जैसे भी हो हमेशा दर्द ही देते है , अब तो ख़ुशी महसूस करना भी , इक बात पुरानी लगती…

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बाबू जी की स्मृति में.. (कविता-6)

बाबू जी की याद बहुत ही आती हैं            स्मृतियों की विपुल राशि संग लाती है… बचपन की धुंधली तश्वीरें जुड़ करके जीवन की आपा-धापी से मुड़ करके नयनों से चुपचाप उतर कर अन्तस् में लगता जैसे पास मुझे वह बुलाती है….          बाबू जी की याद बहुत ही आती है          स्मृतियों की विपुल…

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स्वार्थ निहित राष्ट्रवादियों से सावधान ..!

राष्ट्रवाद के निमित्त देश हित में सामाजिक  रंग और भावना कैसा है,कोई इसे हनुमान की तरह सीना फाड़कर नहीं दिखा सकता। राष्ट्रवादी होने का कोई गीत नहीं गाया जा सकता। राष्ट्रवाद अपने आप में एक जज्बा है, जूनून है जिसे मौक़ा मिलने पर पूरी ताक़त से दिखाया जाना चाहिए ना की पहले भारत तेरे टुकड़े…

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