मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी —डा रेखा यादव ‘निर्झर’
मैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगीमैं ख़ुद को ख़ुद लिखूँगी,और ख़ुद को ख़ुद ही पढ़ूँगी।इन काग़ज़ के पन्नों में छिपीमेरी अनगिनत कहानियाँमेरी आँखों के आँसू ख़ुद पोंछेंगी।मेरा घर कहाँ है?मेरा ठिकाना कहाँ है?शायद इन काग़ज़ के पन्नों मेंमेरी पहचान छिपी होगी।मेरे इन मज़बूत कंधों के भीतररोते हुए एक बेबस दिल की कहानी लिखूँगी।हज़ारों की भीड़ में…
मैं, वो और बैंक
मैं, अर्थात आप ही की तरह साधारण जन,ग्राहक, उपभोक्ता, तथा बैंक का सामान्य कर्मचारी व मध्यम स्तर तक का अधिकारी, जिसे अपने ईमानदारी से कर्तव्य पालन करते हुए परिवार का भरण पोषण करना है। ग्राहक व ये कर्मचारी अपनी पूंजी की सुरक्षा व ऋण ले कर जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की आंकाक्षा को ले…
कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष बने विश्वेश्वर हेगड़े
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक विश्वेश्वर हेगड़े कागेरी, 31 जुलाई २०१९ को कर्नाटक विधानसभा के नए अध्यक्ष चुन लिए गए। भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए विश्वेश्वर हेगड़े को अपना उम्मीदवार बनाया था। विश्वेश्वर हेगड़े उत्तर कन्नड़ जिले में सिरसी से विधायक हैं।
हरिजन सेवक संघ में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध सत्याग्रह करेंगे
आज जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में सत्याग्रह के संयोजक ने बताया कि डॉ अरविन्द कुमार त्यागी व अन्य साथियों ने बहुत पहले से ही घोषणा कर दी थी कि सद्भावना दिवस 24 सितम्बर से गांधी जयंती 2 अक्टूबर 2019 तक हरिजन सेवक संघ में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध सत्याग्रह करेंगे जैसे ही सत्याग्रह शुरू किया…
कहानी : सड़क दुर्घटना
अंधेरी रात और लगभग 9 बजे का समय, मै और मेरा बॉस (राज) उनकी कार से घर लौट रहे थे। हम दोनों एक ही गाव के निवासी थे। वह मुझसे किराया तो नहीं लेता था परन्तु किराए की एवज में मुझे उसकी हां मे हां मिलनी पड़ती थी। उसकी झूठी तारीफ भी करनी पड़ती थी…
ठंड के रंग बेढंग
लो फिर शीत ऋतु आ गई लो फिर शीत ऋतु आ गई। छाया सा है कोहरा कोहरा अंधियारा सा पसरा पसरा धुंधली सी धुंध छा गई। लो फिर शीत ऋतु आ गई । शाखों पर पंछी सहमें सहमे कोतूहल से बहमें बहमें क्यों दिन में रात आ गई। लो फिर सी ऋतु आ गई है।…
बेटी दोहरा रही है
माँ अपनी आँखों से काजल उतार कर मेरे माथे पर टिका लगाती| मेरे होंठों पर लगे दूध को अपने आँचल से पोछती होठों से प्यार की चुम्बन देती माथे पर शुभ आशीष की तरह | फिर भी माँ के मन मे नजर ना लग जाए कहीं भय समय रहता | भले ही माँ भूखी हो…
अब के बरस मानव चेतना की जागृति के दीप जलाएँ
कविता मल्होत्रा (संरक्षक एवं स्थाईस्ताभ्कर) राम राज्य की आकांक्षा तो सभी किया करते हैं मगर खुद राम होने से डरते हैं।अग्नि परीक्षा महिलाओं की ज़िम्मेदारी है।आज तक द्रौपदी का चीरहरण जारी है। कितने युग बीत गए मगर उस युग की महक आज भी हर एक मन को सुवासित करती है।कौन है जो मीरा के भक्तिभाव…
हम पहुँच वाले लोग हैं, हमारा दुख भी वीआईपी है
हर भावना का प्रदर्शन, हर रिश्ते का प्रचार, और हर मौके का राजनीतिक/सामाजिक इस्तेमाल।) — डॉ. सत्यवान सौरभ मकान का मुहूर्त हो या दुकान का उद्घाटन, शादी-ब्याह की खुशियाँ हों या किसी अपने की मृत्यु का गम—हर जगह बड़े नेताओं और अफसरों की तस्वीरें चिपकाना अब “सम्मान” नहीं, बल्कि प्रभाव और पहुँच का प्रदर्शन बन…
