अंततः आप पार्टी दिल्ली का चुनाव हार ही गई………बहुत लोगों ने बहुत सालों से ऐसा दिन देखने के लिए बहुत सारे सपने देखे थे । पिछले चुनाव में आप पार्टी को जिस तरह से 67 सीटें मिलीं थीं उसे देखकर यह अंदाज लगा पाना कठिन था कि आप पार्टी इस चुनाव में इतनी बुरी तरह से हार जाएगी । आप पार्टी की इस पराजय में आप पार्टी के नताओं का योगदान तो है ही साथ ही भाजपा की सोची समझी रणनीति भी कामयाब रही है । भाजपा कभी ‘‘हार’’ न मानने वाली पार्टी है, वह हर बार अपनी पराजय से सबक लेती है और उन कारणों का इमानदारी के साथ विश्लेष्ण करती है जो उसकी जीत में अवरोध बने होते हैं, दिल्ली में भाजपा के लिए अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों की ईमानदार वाली छवि अवरोध बनी महसूस हुई तो भाजपा ने सबसे पहले उनकी इस छवि को बिगाड़ा । उसके हाथ आप पार्टी की शराब नीति आ गई तो उसने इसे भुजने में कसर नहीं छोड़ी । आप पार्टी के हर वह नेता जो अपनी छवि के साथ आम लोगों में लोकप्रिय था उसे शराब नीति के कठघरे में खड़ा किया गया और दिल्लीवासियों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि भोली सूरत के पीछे भ्रषचार पनप रहा है, श्रनैः-शनैः लोगों को भी लगने लगा कि ‘‘आग वहीं लगती है जहां धुआं होता है’’ याने कुछ तो गड़बड़ है तब ही तो आप पार्टी के नेता जेल जा रहे हैं, यह भाजपा की पहली सफलता थी, उसने आम लोगों के इस भ्रम को तोड़ना प्रारंभ कर दिया था कि आप पार्टी के नेता और अरविन्द केजरीवाल ईमानदार हैं । भाजपा ने दूसरा मुद्दा उन योजनाओं की विफलता का उठाया जिसके बल पर अरविन्द केजरीवाल गर्व के साथ कहते थे कि उनकी सरकार ने दिल्लीवासियों के लिए वो सब कुछ किया है जो कोई भी सरकार कभी नहीं कर पाई ं भाजपा ने एक-एक कर उनकी कमियों को उजागर करना श्रुरू किया तो महसूस हुआ कि वाकई इन योजनाओं में बहुत सारी पोलें हैं । आप पार्टी के बड़े नेता जेल में थे तो इन पोलों को पूरने का काम नहीं किया जा सका, दूसरे दिल्ली के उपराज्यपाल के पास चुनी हुई सरकार से अधिक ताकत देकर आप पार्टी का खेल बिगाडा गया । ऐसा महसूस होने लगा कि दिल्ली के नगरनिगम परिष्द के पास दिल्ली सरकार से ज्यादा ताकत है । उपराज्यपाल आप सरकार की हर उन योजनाओं को समझने में और नकारने में समय लगाने लगे जिन्हें आप पार्टी जनकल्याणकारी योजना मानती थी और उसे भरोसा था कि ये योजनायें दिल्लीवासियों को उनकी ओर खींचने में सफल हो सकती हैं । दिल्ली में आप पार्टी ने चुनाव को लेकर जिन योजनाओं को संकज्ल्पपत्र के रूप् में प्रस्तुत किया भाजपा ने उससे अधिक प्रदर्शित कर दिया । भाजपा के पास जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं की बड़ी फौज है, जो घर-घर जाकर सह समझाने मे लग गई कि आप पार्टी के कारण दिल्ली का विकास अवरूद्ध हो रहा है, वहीं आप पार्टी के पास गिनेचुने नेता ही हैं जो घर-घर जाकर तो अपनी विकास यात्रा समझा नहीं सकते वे केवल भाष्ण देकर ही बताते रहे कि उन्होने फला-फलां काम किया है । अरविन्द केजरीवाल ने अपने से कोई दो नम्बर भी न हो जाए संभावना को दृष्टिगत रखकर आप पार्टी के गठन में मुक्ष्य भूमिका निभानेवाले कई बड़े नेताओं को पार्टी से बहुत पहले ही निकाल दिया था तो अब पूरी पार्टी केवल अरविन्द केजरीवाल, संजय सिंह, मनीष्र सिसोदिया और भगवतमान पर ही निर्भर रहकर रह गई । वहीं भाजपा के पास केन्दीय मंत्रीमंडल के बड़े-बडत्रे मंत्री के साथ ही साथ विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तक पार्टी के कार्यकर्ता बनकर चुनाव में मुख्य भूमिका निभाते दिखाई दिए । आप पार्टी को पराजित करने में कांग्रेस ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई । दरअसल कांग्रेस को आप पार्टी से पंजाब, हिमाचल प्रदेश से लेकर हरियाणा तक का बदला लेना था जहां आप पार्टी ने इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद अलग से चुनाव लड़ा था, इसका परिणाम था कि पंजाब में तो कांग्रेस पूरी तरह सिमट गई, पहीं हिमाचल में वह कम सीटें ले पाई और हरियाणा में जीते-जीतते रह गई । उत्तराखंड में भी आप पार्टी ने कांग्रेस को परेशान किया । कांग्रेस ने आप पार्टी के साथ मिलकर दिल्ली का लोकसभ चुनाव तो लड़ा था पर उसे एक भी सीट नहीं मिल पाई थी संभवतः यह क्षोभ उसके मन में था । उक बात तो राजनीतिक विशलेषक मानते हैं कि यदि चौथी बार ाप पार्टी दिल्ली की विधानसभा में सत्ता पा लेती तो वह इंडिया गठबंधन के संयोजक पद पर अपना दावा ठोक देती जिस पर अभी कांग्रेस काबिज है । इसको लेकर कांग्रेस के खिलाफ आवाजें उठ भी रहीं हैं । हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में कांग्रेस की अच्छी स्थिति नहीं आई तो ममता बैनर्जी से लेकर कांग्रेस के सबसे विश्वसनीय साथी माने जाने वाले लालू यादव तक ने कांग्रेस को संयोजक पद से अलग करने की मांग कर डाली । इंडिया गठबंधन में कांग्रेस अकेली पड़ती दिखाई दे रही है । चूंकि आप पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हो चुका है जो कांग्रेस के अलावा किसी और पार्टी के पास नहीं है तो कांग्रेस के बाद आप पार्टी ही इंडिया गठबंधन की मजबूत दावेदार के रूप् में उभर रही थी । कांग्रेस का दिल्ली विधानसभा चुनावलड़ना मजबूरी भी था और जरूरी भी । मजबूरी इसलिए कि चुनाव में उसका वोट प्रतिशत निरंतर कम होता जा रहा था और जरूरी इसलिए कि वह आप पार्टी को चौथीबारदिल्ली की कुर्सी में काबिज होते नहीं देखना चाहती थी यदि ऐस होता तो इंडिया गठबंधन के संयोजक बनने में आप पार्टी को मजबूती मिलती । इंठियागठबंधन में शामिल हर एक दल ने कांग्रेस के दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के फैसले की आलोचना की थी और आप पार्टी को ख्ुला समर्थन दिया था । कांग्रेस इससे विचलित हुए बगैर मजबूती के साथ चुनाव में जुटी रही । आप पार्टी के दिल्ली विधानसभा चुनाव के हारने में कांग्रेस का दिल्ली विधानसभा का चुनाव मजबूती क साथ लड़ना भी रहा । यह सही है कि कांग्रेस इस चुनाव में भी कोई सीट नहीं जीत पाई पर सच यह भी है कि उसका वोट प्रतिशत पिछली बार से अधिक हुआ है भले ही उम्मीद से अधिक न हुआ हो, इसमें यह तथ्य भी शामिल किया जा सकता है कि आप पार्टी के एक दर्जन से अधिक विधायक जिनी वोटों से पराजित हुए उनसे वाटों से अधिक या लगभग समकक्ष वाटें कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी पे प्राप्त किए हैं । आप पार्टी की पराजये कांग्रेस खुश है और उसे लगता है कि गठबंधन न हो पाने का जो नुकसान आप पार्टी को उठाना पड़ा है उससे गठबंधन में शामिल अन्य क्षेत्रीय दल सबक अवश्य लेगें । पर ऐसा भी होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है, बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव होना हैं और वहां सत्तारूढ़ टीएमसी ने साफ कह दिया है कि वह कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करेगी, वैसे भी ममता बनर्जी कांग्रेस को अपना दुश्मन ही मानती हैं, गठबंधन की तमाम मजबूरियों के बाद भी वे कांग्रेस के प्रति अपनी भावनाएं सार्वजनिक रूप् से व्यक्त करने में कभी पीछें नहीं रहीं हैं । अब पर्व राष्ट्रपति और कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे प्रणव मुखर्जी के बेअे अिानव मुखर्जी जो पहले कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में चले गए थे वे भी वापिस कांग्रेस में आ गए हें, इससे भी पश्चिमबंगाल कांग्रेस को मजबती मिलेगी । ममता बनर्जी की इस घोषणा के बाद कांग्रेस भी वहां विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगी है । कांग्रेस के नेता अधीररंजन चौधरी भी ममता बनर्जी के मुखर विरोधी हैं तब निश्चित ही गठबंधन से परे जाकर कांग्रेस पश्चिमबंगाल में चुनाव लड़ेगी, अब तो अभी से नहीं कहा जा सकता कि वह पश्चिम बंगाल में भी आप पार्टी जैसा ममता बनर्जी को नुकसान पहुंचाएंगीं । दरअसल कांग्रेस तमाम कोशिशों के बाद भी अपनी राष्ट्र पार्टी की छवि के अनुरूप् प्रदर्शन नहीं कर पा रही है, उसका जमीनी कार्यकर्ता गुम हो चुका है और बड़े नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं । राहुल गांधी को भाजपा हर दम घेरती रहती है और उनके हर एक बयान में नुक्श निकालकर उन्हें कठघरे में खड़ा करती रहती है । इसके बावजूद भी राहुल गांधी जितना मुखर होकर भाजपा के खलाफ बयानबाजी करते हैं, लोकसभा में बोलते हें, उतना मुखर होकर और कोई नहीं बोल पाता है । समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को ही घेरने की कोशिश करते हैं, याने उनके लिए अभी उत्तर प्रदेश ही महत्वपूर्ण है जिसको लेकर लोकसभा चुनावों में मिली उनको सफलता है । वैसे इसके बाद उत्तरप्रदेश में हुए लगभग हर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को सफलता नहीं मिल पाई । मिल्खी विधानसभा उपचुनाव में भी उसे करारी हार का सामना करना पड़ा है । सह सीट तो समाजवादी पार्टी के पास ही थी, जो विधायक चुने गए थे वो लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बन गए अबके उनके द्वारा रिक्त की गई सीट पर समाजवादी पार्टी को जीत हासिल कर लेने की पूरी उम्मीद थी पर ऐसा हो नहीं पाया । लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के कारण समाजवादी पार्टी के हौसेल बंलद हो गए थे और वे आगामी विधान सभा चुनाव में अच्छे परिणाम की उम्मीद लगाए बैठे हैं, पर उप चुनावों में लगातार मिल रही पराजय से वे कितना सबक लेते हें यह देखना होगा, वैसे अखिलेश यादव ने लोकसभा का चुनाव कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लड़ा था पर बाद में उनको यह लगने लगा कि वे अकेले ही चुनाव लड़ेगें, ऐसे में कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप पार्टी को हराने के अपने प्रयास के बाद उत्तरप्रदेश के विघानसभा चुनावों में अपी हैसियत को मजबूत कर लिया है, पर जैसे ममता बनर्जी ने कांग्रेस को अलग-थलग कर दिया है वैसे ही अखिलेश यादव कर पाएं ऐसा कठिन ही होगा । दिल्ली विधान सभा चुनावों के परिणाम के बहुत मायने हैं, जो राष्ट्रीय स्तर से लेकर क्षेत्रीय स्तर तक नये राजनीतिक समीकरण बना सकते हैं । यह सही है कि अब इंडिया गठबंधन बिखराव के रास्ते पर हे पर सच यह भी है कि यह बिखराव इंडिया गठबंधन में शामिल हर एक राजनीतिक दल को नुकसान ही पहुंचायेगा । कुम्भ का मेलाप्रयागराज में चल रहा है, तमाम कोशिशो के बाद भी मेला आमजन के लिए सुविधाजनक नहीं रहा । उम्मीद से अधिक श्रद्धालुओं का आना, वैसे तो इतने श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद तो लगाई ही गई थी और बहुत बेहतर व्यवस्था की है का राग भी अलापा गया था, पर ऐसा हो नहीं पाया । श्रद्धालुओं ने भारी परेशानियों के साथ गंगाजी में स्नान कर अपना धर्म कार्य पूरा किया पर इससे कुम्भ की व्यवपक तैयारियों के दावे पर जरूर प्रश्नचिन्ह लग गया है । वैसे कुम्भ की अव्यवस्था वीआईपीओं के कारण सबसे अधिक खराब हुई है ऐसा आरोप है, एक ओर जहां आम श्रद्धालु दस-दस घंटे के बाद भी संगम स्थल तक नहीं पहुंच पा रहा था, वैसे में वीआईपीयों की कारों का काफिला बेरोकटोक अपनी गाड़ियों को दौड़ाता हुआ संगम में पहुंच जाता था और पुलिस के सरंक्षण में पुण्य कार्य कर अपने वीआईपी होने के घमंड को प्रदर्शित करने में नहीं हिचक रहा था । उत्तरप्रदेश के एमएलसी ने तो वीआईपी सुविधा से उनकी संगम लगाई गई डुबकी की रील ही सोशलमीडिया पर डालकर यह जता दिया कि उत्तरप्रदेश का भाजपा का एमएलसी भी इतना वजनदार होता है कि उसकी कार का दरवाजा पुलिस विभाग के उच्चाधिकारी खालतेहैं और वो श्रान से गाड़ियों का काफिला लेकर कुम्भ में जा सकता है । मुख्यमंत्री कितना भी दावा करें पर इस सच्चाई से वे भी नहीं पलट सकते कि धर्मस्थल पर जहां अमीर-गरीब का भेद खत्म हो जाना चाहिए वहां यह खेल पूरी बेशर्मी के साथ खेला गया और आमजन धक्कामुक्की खाकर परेशान होता रहा । बुजुर्ग, महिला और बच्चे इस अव्यवस्था का शिकार हुए । भीड़ को तो रेल से लेकर निजी वाहनों से आने-जाने और प्रयागराज पहुंच कर संगम स्थल तक जाने में भी परेशान होना पड़ा, न कहीं डिजिटलाईजेशन नजर आया और न ही प्रशासनिक व्यवस्था ही । मुख्यमंत्री ने मेला के डिजिटाइलेशन की बात गर्व से की थी पर सारी बातें हवा-हवाई साबित हुई । मेला तो पूर्णता की ओर है पर इसकी अव्यवस्था याद रखी जायेगीं । वैसे इसके बाद अर्धकुम्भ मध्यप्रदेश के उज्जैन में लगना है तो वहां की सरकार इससे सबक ले और अपनी तैयारियों को दुरस्त कर ले, नहीं तो वह तो प्रयागराज से बहुत छोटा स्थन है तो वहां ज्यादा अव्यवस्था दिखाई देगी ।
‘आप’ ने गवां दी सत्ता : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
