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श्रावण में शिव भक्ति और आध्यात्मिकता

हिंदू सनातन धर्म में शिव भक्ति का विशेष  महत्त्व है । भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है ।वह जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं । सोमवार के दिन चंद्र देव ने भगवान शिव का पूजन कर क्षय रोग से अपने प्राण बचाए थे। सोमनाथ का ज्योतिर्लिंग मंदिर इसी का प्रमाण है। इसलिए भगवान को सोमवार का दिन विशेष प्रिय है । सोमवार के साथ यदि श्रावण मास हो तो भगवान शिव भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं।इसीलिए उन्हें आशुतोष और भोले भंडारी के नाम से भी जाना जाता है।

 श्रावण मास में ही शिव भक्ति अधिक क्यों होती है ।श्रावण मास में  मंदिरों  देवालयों में एवं शिव भक्त अपने-अपने घरों में मिट्टी के शिवलिंग बनाकर पूरे श्रावण मास पूजा पाठ करते है ।पूरा हिंदू समाज श्रावण मास में शिव भक्ति में लीन हो जाता है।युवा वर्ग  गंगा जैसी पवित्र नदियों से जल भरकर कांवड़ द्वारा नंगे पैर शिव मंदिरों में जल चढ़ाने जाते हैं। हमारे सनातन धर्म में पौराणिक कथाएं ऐसे ही नहीं लिखी गई हैं, इनका कुछ ना कुछ आध्यात्मिक रहस्य होता है ।

श्रावण मास में पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने शिवजी को पति रूप में पाने के लिए श्रावण मास में केवल बिल्व पत्र खाकर घोर तप किया था ।और भाद्रपद की हरितालिका तीज को तीन दिन सिर्फ वायु का सेवन करके व्रत किया था। तब शिव जी प्रसन्न हुए उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए ।दूसरी कथा  देवता और दानवों के द्वारा समुद्र मंथन भी श्रावण मास में ही हुआ था ।समुद्र मंथन से चौदह रत्नों के साथ-साथ हलाहल विष भी निकला। विष की ज्वाला से देवता और दानव जलने लगे। देवताओं ने भगवान शिव से हलाहल विष से रक्षा करने के लिए प्रार्थना की। तब भगवान ने हलाहल  का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में ही स्थापित कर लिया ।जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया ।तब से भगवान का एक नाम नीलकंठ महादेव भी पड़ गया। सभी देवताओं ने भगवान शिव के अंदर  हलाहल की ज्वाला के ताप से शांति दिलाने के लिए भगवान शिव के ऊपर धतूरे का फल चढ़ाए ।कहते हैं विष विष को मारता है ।इसी तरह विल्ब पत्र का लेप भगवान शिव के शरीर में लगाया। गंगाजल से अभिषेक किया, तभी आकाश ने भी श्रावण में रिमझिम वर्षा की फुहार से शिवजी का अभिषेक किया ।जिससे सारी पृथ्वी की प्रकृति हरी-भरी शीतलता लिए सुहावनी हो गई। पशु पक्षी और पेड़ पौधों में भी प्राकृतिक रूप से उल्लास भर गया ।

अज्ञानों द्वारा कहा जाता है कि शिव भांग धतूरे का नशा करते हैं। जो गलत है वैज्ञानिक कारण है कि भांग की प्रकृति शीतल होती है ।इसीलिए भगवान शिव को भांग विल्ब पत्र ,जल, दूध, दधि, मिश्री ,मधु आदि से अभिषेक किया जाता है। और भगवान शिव को अभिषेक करने से अति प्रसन्नता होती है । भगवान शिव भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं। शिव के माथे पर अर्धचंद्र को दर्शाया जाता है ।क्योंकि चंद्रमा भी शीतलता प्रदान करता है। इसके साथ भगवान शिव के तीन नेत्र हैं त्रिशूल भी तीन फन है ,एवं बिल्व पत्र में भी तीन पत्ते होते हैं। जो ब्रह्मा विष्णु महेश के प्रतीक हैं। विल्ब में  तीन पत्ते होते हैं जो सत्व रज तम के प्रतीक हैं । मनुष्य की प्रकृति भी तीन प्रकार की होती है ।सत्व रज तम,  भगवान शिव पर मनुष्य विल्ब पत्र चढ़ाता है तो मनुष्य की तीनों प्रकृति में बैलेंस बना रहता है ।क्योंकि इन तीनों में से किसी एक की अधिकता या न्यूनता मानव जीवन का संतुलन बिगाड़ सकती है ।भगवान शिव त्रिगुणातीत हैं। वह इन तीनों गुणों से परे हैं ।इसलिए भगवान शिव के ऊपर विल्बपत्र  चढ़ाने से हम अपनी तीनों प्रकृतियों को भगवान शिव को अर्पण करते हैं। जिससे कि भगवान अति प्रसन्न हो जाते हैं ।इस तरह से हमारे पौराणिक ग्रंथों में

कुछ न कुछ संदेश, मनुष्य जीवन का आधार,

 आध्यात्मिकता का रहस्य छुपा हुआ होता है।

हेमलता राजेंद्र शर्मा मनस्विनी साईंखेड़ा नरसिंहपुर मध्यप्रदेश

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