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तब कविता कुछ कहती है

व्यथा से मन की उर्वर भूमि में भावो का रोपण होताकरुणा संग सींचा जाता शब्दों सेतब कविता कहती है। वेदना के स्वर पत्थरों पर गुजर कर पिघला देतेरस की धारा बहती कलम चलती तब कविता कहती है। हृदय की टीस आंसुओं से ना निकल कर कलम सेकरुणावर्षा होती धरा के आंचल तब कविता कहती हैं।…

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परीक्षा से आगे सोचना होगा: शिक्षा का असली मकसद – डॉ विजय गर्ग

  आज के दौर में ‘शिक्षा’ और ‘परीक्षा’ एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। जैसे ही बच्चा स्कूल में कदम रखता है, उसके सीखने की यात्रा अंकों और ग्रेड्स की दौड़ में बदल जाती है। लेकिन क्या जीवन की सफलता केवल उत्तर पुस्तिकाओं में लिखे गए शब्दों तक सीमित है? समय आ गया है कि…

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आशा-आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का स्वैच्छिक योगदान

-डॉ. प्रियंका सौरभ क्या राष्ट्र के स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली इन महिलाओं को श्रमिक का दर्जा नहीं दिया जाएगा? आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की ज़रूरतें असाधारण नहीं हैं; उन्हें न्यूनतम वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, तृतीय श्रेणी कर्मचारी का दर्जा और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है। फिर भी, सरकारें उन्हें औपचारिक श्रम अधिकारों से वंचित रखती हैं…

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कहानी : रिश्तों की जड़ें

परिवार बड़ा था, घर पुश्तैनी और उसमें ज़िम्मेदारियाँ सबसे भारी। इसी भार को अपने कंधों पर उठाकर संजय ने एक दिन वह निर्णय लिया, जिसने उसके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। पुश्तैनी दुकान, बूढ़ी माँ, पत्नी और दो छोटे बच्चे, सबको पीछे छोड़कर वह विदेश चला गया। परदेश उसका सपना नहीं था, मजबूरी थी।…

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दर्द ए आरक्षण (सुनील शर्मा)

लोकतंत्र में राजतंत्र का ही पलड़ा भारी है!कोई भी हो सत्ताधारी वोटों का व्यापारी है!!रोजगार के चक्कर में सड़कों पर युवा भटकते हैं!जब भी हक की बात करो आंखों के बीच खटकते हैं!!पढ़ लिख कर जो ख्वाब थे देखें सारे चकनाचूर हुए!कुछ आरक्षण की चक्की में पीसने को मजबूर हुए!!राजतंत्र के आगे देखो लोकतंत्र ही…

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भारतीय राजनीति में आज भी प्रासांगिक एव अद्वीतीय है महात्मा गांधी (पुण्य तिथि-30 जनवरी पर विशेष)

लाल बिहारी लाल भारत में सत्ता दिल्ली सलतनत से मुगल साम्राज्य फिर मुगल से जब सत्ता अंग्रैजो के हाथ में गई तो पहले अंग्रैजों का व्यापारिक उदेश्य था पर धीरे-धीरे उनका राजनैतिक रुप भी समने नजर आने लगा। और वे अपने इस कुटिल चाल में कामयाब भी हो गये । धीरे –धीरे उनके क्रिया-कलापों के…

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अ से ज्ञ अलंकृत अनुप्रास  

‌अरुणोदय लालिमा अम्बर पथ  सोहेअवनि अंशुमय अंर्तमन मोहे | आभूषित आभामंडल आकाशदीप राशि मेंआध्यात्मिक मन आनंदित आलोकित काशी में | इन्दु रश्मिमयी धरा पुलकित इन्दिवर मन मोहेईश पूजन चली सखियां इंगुर श्रृंगार सोहे | उषाकाल लालिमा भरी क्षितिपथ धरणी उमंगउदित भानु उत्पल खिला उद्यान पुष्प बहुरंग | ऋत्विक ऋजु मनिषी श्रेष्ठ सर्वदाऋषि तप भूमि तट…

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शीर्षक-लघु व्यंग  झूले के संग

कुछ दिन पहले तीज पार्टी में एक एक सखी  ने स्टिकर डाला था जिसमें झूला झूलते हुए आनंद लेते हुए  मुझे वह दिन याद आ गए बचपन के  दिन जब मैं स्कूल में झूला पंगे डाल डाल कर झूलती थी । हमारा स्कूल में एक झूला विशालकाय था जिसमें तीन तीन झूले थे .लंच के…

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क्या नए वर्ष 2026 की तश्वीर से साफ हो पायेगी 2025 की धूल..!

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  बीते वर्ष 2025 में कई चीजे रही जो भूलने के बाद भी याद आती रहेंगी जिनमें कुछ सामाजिक और राजनैतिक  अवसाद और संवैधानिक  अपवाद रहें। बिहार चुनाव में विपक्ष की हार हो या सोने चांदी के कीमतों की मार ! स्मृति मंधना की शादी टूटने की…

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जीवन का सुख़ बुजुर्गों के श्रीचरणों में  

बूढ़े बुजुर्गों, माता-पिता की सेवा तुल्य कोई पुण्य नहीं-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र   गोंदिया – भारत आदि-अनादि काल से ही संस्कारों की खान रहा है। यहां की मिट्टी में ही गॉड गिफ्टेड संस्कारों की ऐसी अदृश्य शक्ति समाई हुई है कि मानव जन्म से ही संस्कारों की प्रतिभा मानवीय जीवों में समाहित हो जाती…

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