तब कविता कुछ कहती है
व्यथा से मन की उर्वर भूमि में भावो का रोपण होताकरुणा संग सींचा जाता शब्दों सेतब कविता कहती है। वेदना के स्वर पत्थरों पर गुजर कर पिघला देतेरस की धारा बहती कलम चलती तब कविता कहती है। हृदय की टीस आंसुओं से ना निकल कर कलम सेकरुणावर्षा होती धरा के आंचल तब कविता कहती हैं।…
