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संस्मरण : गर्मी की छुट्टियां और बचपन  

        बहुत पहले की बात है। नेहा गर्मी की छुट्टियों में गांँव गई तो एक तो शहर से आने का रुतबा,दूसरा शहरी लड़की होने का एहसास उसे सबसे अलग कर रहा था। गाँव में शहर से आने वालों की कद्र कुछ ज्यादा ही होती थी। मानों आकाश से कोई भगवान ही उतर…

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तेल,युद्ध,ब्याज दर और निवेश: वैश्विक आर्थिक तूफान में भारत की बाजार- नाव कितनी सुरक्षित? -वैश्विक संकटों के बीच भारतीय बाजार की चमक: मजबूत अर्थव्यवस्था या विदेशी पूंजी का अस्थायी सहारा? -समग्र व्यापक विश्लेषण

वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, कच्चा तेल और ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच भारतीय शेयर बाजार की मजबूती -क्या भारत विश्व आर्थिक अनिश्चितता में निवेश का नया सुरक्षित केंद्र बन रहा है? क्या भारत ऐसी मजबूत, समावेशी और आत्मनिर्भर आर्थिक संरचना तैयार कर रहा है,जो तेल के झटकों,युद्ध के प्रभाव, विदेशी पूंजी की निकासी और वैश्विक…

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परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता की नई कसौटी

भारत की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली केवल योग्य अभ्यर्थियों के चयन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अवसर, सामाजिक न्याय और योग्यता आधारित प्रतिस्पर्धा का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। करोड़ों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम, आर्थिक सीमाओं और मानसिक दबाव के बीच इस विश्वास के साथ तैयारी करते हैं कि उनकी सफलता का निर्धारण…

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अनैतिक आंदोलन से अनैतिक व्यवस्था बदलने की तैयारी 

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  सीजेपी के आंदोलन के बाद एक और आंदोलन की सुगबुगाहट है और वह है वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के विरोध का। हालांकी इस पर लोगो के अलग – अलग मत है पर एक चीज जो सोचे जाने योग्य है वह है शिक्षा व्यवस्था में उदारीकरण और समानता…

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युवा आंदोलन ओर युवाओ का भविष्य : सतीश शर्मा

आज की युवा पीढ़ी देश का भविष्य है, लेकिन आधुनिक समाज में वे तेजी से भटकाव का शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति न केवल उनके व्यक्तिगत विकास को रोकती है, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करती है। युवा आंदोलनों का इनके  जीवन पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का प्रभाव पड़ता है, इसलिए यह…

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सुरक्षित समाज और कार्यस्थल

पुरुषों की सारथी भूमिका ​एक प्रगतिशील समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ कितनी ऊँची इमारतें हैं,बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ महिलाएँ कितनी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करती हैं। घर की चारदीवारी से लेकर दफ्तर के केबिन तक,महिलाओं ने अपनी योग्यता को साबित किया है। लेकिन इस सफर को…

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बंजर आत्मा (लघुकथा)

वह भीतर से चुप था — इतना चुप, कि अब उसकी आत्मा भी किसी आहट से नहीं कांपती थी। सावन की फुहारें बरसतीं तो थीं, पर अब उसकी आँखों में नमी नहीं बची थी। रिश्तों की मिट्टी को सींचते-सींचते वह स्वयं दरक चुका था। भीतर की धरती अब केवल दरारों से भरी थी — वहाँ…

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प्रेम,love,attracfion : आशा सहाय 

मेरे घर के बरामदे मे कपड़े  सूखने के लिए टाँगीगई एक अलगनी पर एक अत्यंत छोटी सी चिरैया ने पंखों का एक छोटा सा घोंसला बना लिया अथवा यों कहूँ कि लटका लिया है।सफेद छोटे छोटे पंखों का एक आकर्षक घोंसला।आश्चर्य होता है कि कहाँ से उसने इतने छोटे छोटे पंख ढूँढे होंगे।मै चिकित्सीय कारणों…

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न्यायालय की गरिमा और लोकतंत्र की परीक्षा

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में न्यायपालिका केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, विधि के शासन और राज्य की जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। जब कोई नागरिक न्यायालय की चौखट पर पहुंचता है, तो वह केवल अपने विवाद का समाधान नहीं चाहता, बल्कि उसे इस बात का भरोसा भी होता है कि उसकी…

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न्याय के मंदिर की गरिमा और नागरिक मर्यादा :   डॉ. सत्यवान सौरभ

भारतीय लोकतंत्र की संपूर्ण संरचना चार प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—पर आधारित है। इनमें न्यायपालिका वह संस्था है, जिसके समक्ष प्रत्येक नागरिक अंतिम उम्मीद लेकर पहुँचता है। जब प्रशासनिक तंत्र विफल हो जाता है, जब शासन से निराशा हाथ लगती है और जब अधिकारों का हनन होता है, तब नागरिक न्यायालय का दरवाज़ा…

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