
पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी
हमारे ऊपर जो विदेशी कर्ज बढ़ रहा है उसके लिए हमें विदेशी मुद्राओं को एक वर्ष तक संयमित खर्च करने की आवश्यकता है, इसके लिए अब जागने के बाद जब सोना ना खरीदने और पेट्रोल डीजल बचाकर अर्थात ज्यादा उपयोग ना करने का आह्वान हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने हम सभी से किया तो मैंने सोचा इस लेख के माध्यम से जनता से पूछ ही लूँ की आपकी देशभक्ति और हिंदुत्व के मुद्दों का क्या हाल है ! चुनाव, यूजीसी, जातिवाद इत्यादि के मुद्दों में उलझें रहे हम और खाद्यान एवं गैस सिलेंडर कब महंगा हो गया पता ही नहीं चला। किसानों नें बिजली बिल और नीलगायो के उत्पात से खेती करना छोड़ दिया , महंगाई महंगाई करके हमने सिर्फ आलोचना की है पर हमने कभी विकासवाद को चुना ही नहीं। हमने चुना प्रिया सरोज जैसे सांसद जो कभी जनता के बीच दिखी ही नहीं केवल क्रिकेट स्टेडियम में नजर आई, अवधेश प्रसाद जैसे विधायक जिन्हें केवल रोने की एक्टिंग करनी आती है। इसलिए केवल भाजपा को दोष मत दीजिये। कृपया योगी जी के प्रति एंटीइन्कम्बसी मत फैलाइये , ये महंगाई नहीं है यह आपकी जातिवादी सोच का नतीजा है, ये महंगाई तो 5 राज्यों में हुए लाइट कैमरा एक्शन शूट का बिल आया है। जैसे शादी पूर्ण होने के बाद बिल आता है। जैसे होटल में अच्छी चाय और पिज्जा पूरी खाने के बाद बिल आता है। जैसे आर्केस्टा जैसा कोई प्रोग्राम पूरा होने के बाद बिल आता है। तो इसमें महंगाई का फ़िक्र क्यों भाई ? पिछले 3 महीनों से मोदी जी ने आपको देश के 5 अलग अलग राज्यों की ड्रेस पहनकर दिखाई , रैली रोड शो किए , ममता नें रोकर दिखाया , राहुल गाँधी नें जबरदस्ती विजय के पीछे दौड़ कर फ्लॉफ शो दिखाया, ओवैसी नें सभी राज्यों की भाषा बोलकर दिखाई , भाजपाइयों नें जमकर झालमुडी खाई , शुभेंदु नें हुगली नदी से फोटोग्राफी करके दिखाई , अखिलेश नें बंगाल जाकर टीएमसी और लेफ्ट तक से अपने पुराने रिश्ते नाते निकाले। भाजपा नेताओं नें असम के चायपत्ती बागवानों में प्रोग्राम करके दिखाए , डमरू बजाकर दिखाया , पवन खेड़ा नें वीडियो ब्लॉग बनाकर दिखाया , सेयोनि घोस नें गीत गाने , नाच कुद , करके दिखाया। नितीश नें भावुक होकर दिखाया , कुछ पार्टी प्रवक्ताओ नें बोलते बोलते रो कर दिखाया , ये सब बस उसी का बिल है अब फिल्म का आनंद लिया है तो बिल तो देना ही पड़ेगा ना भाई।
लाइट कैमरा एक्शनइस वैश्विक आपदा के लिए जो जरूरी सुधार का रास्ता है वो हमारे देश में निर्मित सामानो का विदेश में मांग बढ़ाना है ताकि हम उनकी जरूरत बन सके और डंके की चोट पर उन विदेशियों से यह सौदा कर सके कि तुम्हें हमारे देश का माल चाहिए तो हमारे देश की करेंसी में माल खरीदना होगा। अगर तुम्हें अपने करेंसी में माल चाहिए तो आओ हमारे देश में इन्वेस्ट करो। हम यह तय करेंगे कि हमें तुमको माल बेचना है या नहीं। लेकिन यह तभी संभव है जब इस भावना को पूरा देश एक साथ मिलकर समझने का प्रयास करे। आपकी विचारधाराएं जो भी हो मुझे इस बात से जरा भी फर्क नहीं पड़ता, लेकिन ये बात तो सच है कि 70 सालों में जो विदेशी कर्ज 55 लाख करोड़ था वो आज हम पर 300 लाख करोड़ के नजदीक आकर चढ़ बैठा है। साथ ही आगे और भी बढ़ने की संभावना है। अब सवाल यह है कि हमारे देश में ऐसा क्या है कि हम विदेशियों को अपने देश में लाने पर मजबूर कर सके ? जवाब है हमारे देश में मौजूद आयुर्वेदा, धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कृति मजबूत है तो ! भारत तिलहन उत्पादन में दुनिया के अव्वल देशों में से है. दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक देश है। पारंपरिक तौर पर मूंगफली तेल के अलावा हमारे यहां सरसों तेल अधिक उपयोग होता है। नेपाल सरसों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. तो सरसों के तेल का भी जुगाड़ मुश्किल नहीं लगता. सोयाबीन भी हम अच्छा ख़ासा उगाते हैं। चावल हम दुनिया में सबसे अधिक पैदा कर रहे हैं। तो राइस ब्रान ऑयल का विकल्प खुला है। अच्छा तेल न सही, घी का प्रयोग बढ़ा लें, दुग्ध उत्पादन में भी दुनिया में हम सिरमौर हैं। थोड़े दिन सन्फ्लोअर जैसे ग़ैर पारंपरिक तेल भूल जाएं। पॉम ऑयल हमन ज़्यादा इंपोर्ट करते हैं, सीधा उपयोग तो बता नहीं, शायद ब्लेंडिंग का इश्यू हो. क्यों न ई20 जैसा कोई विकल्प खोजा जाए। आत्मनिर्भर का ओवर ख़त्म हुआ, आपदा में अवसर का स्पेल है जी हां, जिसका ज्ञान सिर्फ हमारे देश में मौजूद है उस आयुर्वेदा, धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कृति से बेहतर कुछ भी नहीं है जिसकी प्रभावशीलता इन विदेशियों को घुटनों पर लाने के लिए काफी है। आल ओवर वर्ल्ड में सबसे यूनिक और सबसे पीसफुल इंडियन रिलीजियस कल्चर और स्प्रिचुअल कल्चर है जिसके परिणाम स्वरूप वर्ल्ड वाइड फैल रहे ओवर थिंकिंग के इलाज का सेंटर प्वाइंट बन सकता है भारत, अंग्रेजी दवाओं से चूसे और खोखले किए जा चुके शरीर को लंबे समय तक सम्हाले रखने का जड़ है आयुर्वेदा। प्रधानमंत्री जी ने देश के आम जनता से अपील की है कि डीजल , पेट्रोल जैसे जीवाश्म ईंधन का प्रयोग कम करें। अगर उन्हें वाकई इसकी चिंता है तो पहले उन्हें स्वयं के साथ साथ अन्य माननीयों को नसीहत देना चाहिए (जैसे शास्त्री जी ने किया था ). हमारे देश में लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर कुल 788 सांसद हैं। सभी राज्यों की विधानसभाओं में लगभग 4,123 विधायक हैं। छह राज्यों की विधान परिषदों में लगभग 389 सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त देशभर के शहरी निकायों में लाखों पार्षद हैं। इन माननीयों के लिए अनेक सरकारी वाहन उपलब्ध कराए जाते हैं, जबकि उनकी सुरक्षा व्यवस्था में बड़े-बड़े वाहन काफिले लगाए जाते हैं। वीआईपी मूवमेंट के दौरान आम जनता घंटों ट्रैफिक जाम में फंसी रहती है। लाखों वाहन सड़कों पर इंजन चालू रखे खड़े रहते हैं या आगे पीछे होते रहते हैं , जिससे प्रतिदिन भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन व्यर्थ जलता है। औसतन बड़े माननीयों के सुरक्षा में 20 की संख्या में केंद्रीय पुलिस बल और लगभगउतनी ही राज्यों की पुलिस होती है और आम जन यातायात व्यवस्था सुचारु नहीं होने के वजह से रोज लाखो लीटर जीवाश्म ईंधन यूं ही फूक देते हैं। ये सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ईंधन की भारी खपत बढ़ाते हैं। केवल आम नागरिकों से “कम पेट्रोल-डीजल उपयोग” की अपील करने से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा, जब तक कि वीआईपी मूवमेंट को अधिक सीमित और तकनीक-आधारित न बनाया जाए,अनावश्यक सरकारी वाहनों की संख्या कम न हो , शहरों में स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन लागू न हो,सार्वजनिक परिवहन (बस, मेट्रो, लोकल ट्रेन) मजबूत न किया जाए। भारत जैसे विशाल देश में यदि ट्रैफिक जाम और अव्यवस्थित यातायात में प्रतिदिन लाखों वाहन कम समय तक फंसें, तो वास्तव में करोड़ों लीटर ईंधन की बचत संभव है।
