राजनीतिक सफरनामा
प्रधानमंत्री की अपील ने बढ़ा तापक्रम
कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
बहुत तेज गर्मी है इन दिनों, तापक्रम बढ़ा हुआ है, आमतौर पर हम जितने तापक्रम तक जीना आसान मानकर चलते हैं उससे कहीं ज्यादा तापक्रम दिखाई दे रहा है और अभी तो मई माह का प्रथम पखवाड़ा ही है याने अभी तो और तेज गर्मी पड़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । एक तापकम इन दिनों प्रधान मंत्री जी की अपील ने भी बढ़ा कर रखा है, अपील तो एक है पर उसके बिन्दु सात हैं, वैश्विक संकटों के बीच प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा की गई अपील के सभी अपने-अपने ढंग से मायने निकाल रहे हैं । समूचा विश्व किसी न किसी तरह से संघर्ष और युद्ध से जूझ रहा है, यूक्रेन और रूस का युद्ध इतना लम्बा चलेगा कोई नहीं जानता था, यूक्रेन अनाज उत्पादक देश माना जाता था, युद्ध के कारण अनाज का उत्पादन प्रभावित हुआ और अब ईरान और अमेरिका का युद्ध सामने आ गया, हांलाकि युद्ध विराम तो हो चुका है पर पूर्ण रूप् से युद्ध खत्म नहीं हुआ है । ईरान तेल उत्पादक देश है तो तेल का संकट तो पैदा होना ही था, साथ ही समुद्री मार्ग हार्मुज पर जहाजों के आवागमन में अवरोध पैदा होने से गैस सहित अन्य दैनिक उपयोग मेें आने वाली वस्तुओं पर भी प्रभाव पड़ने लगा है । इससे वैश्विक संकट से विश्व कब निपट पाएगा अभी तो कहा नहीं जा सकता, पर इससे निपट पायें इसके लिए कुछ सावधानियों रखी ही जानी चाहिए । प्रधान मंत्री मोदी जी ने इसी की तरफ ईशारा कर लोगों से सावधानी बरतने की अपील की । पेट्रोल, डीजल जैसी दैनिक उपयोग में आने वाला ईधन की बचत हो इसके लिए वाहनों के कम उपयोग की बात की गई है, करोड़ों वाहन लोगों के पास है, प्रतिदिन लाखों लीटर पेट्रोल, डीजल की खपत आम आदमियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वाहनों में खर्च होता है, जाहिर है कि भविष्य में यदि पेट्रोल, डीजल का संकट गहराया तो वाहनों के पहिए तो बिलकुल ही थम ही जायेगें तो हम अभी से इसका उपयोग सीमित कर दें, तो क्या बुराई है । वैसे भी भारत में ई वाहनों के उपयोग पर जोर दिया जाता रहा है और शनैः-शनैः न केवल इनका उत्पादन बढ़ा है साथ ही इनका उपयोग भी बढ़ा है, इससे पेट्रोल, डीजल की खपत में कमी तो आ ही रही है बाकी जो लोग अभी इनका उपयोग नहीं कर रहे हैं उनको भी चाहिए कि वे भविष्य के दृष्टिकोण से ई वाहनों का उपयोग करें, अपने निजी वाहन भी कम चलाएं यह तो हमेशा के लिए उपयोगी है । वैसे भी पेट्रोल, डीजल से होने वाले प्रदूषण से जनजीवन प्रभावित हो ही रहा है, आज जिस ढंग का तापक्रम बढ़ता महसूस हो रहा है, वह ग्लोबल वार्मिग की चेतावनी की अनदेखी का ही परिणाम है । मोदी जी ने इसके कम उपयोग की अपील की है, साथ ही वर्क फ्राम होम का सुझाव भी दिया है । लांकडाउन के समय हमने वर्क फ्राम होम की पद्धति को स्वीकारा तो हमारा काम रूका भी नहीं और आफिस जाने की समस्या से भी जूझ पाए । सार्वजनिक वाहनों का उपयोग हमें पेट्रोल, डीजल की खपत को कम करने मे मददगार साबित हो सकता है । इसकी शुरूआत मोदी जी ने और उनके केबिनेट करनी भी प्रारंभ कर दी है जाहिर है कि यह भविष्य के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है । विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी होती है । विश्व बाजार में विदेशी मुद्रा का होना बहुत आवश्यक होता है, कई निर्यातक देश ऐसे हैं जो विदेशी मुद्रा में ही लेन देन करते हैं तो विदेशी मुद्रा का बचाना भी बहुत जरूरी है पर वो तब ही बच पाएगी जब हम ऐसे सामानों का उपयोग कम कर देगें जिन्हें हमें विदेशी मुद्रा से खरीदना पड़ता है । सोना भी उनमें से एक है । आंकड़े बताते हें कि भारत कई टन सोना हर साल आयात करता है, हमारे देश में तो सोने की खदान हैं नहीं लगभग दस प्रतिशत सोना ही हमारे पास उपलब्ध होता है बाकी 90 प्रतिशत सोना आयात ही करना पड़ता है । जो सोना आयात किया जाएगा वह विदेशी मुद्रा में खरीदना पड़ता है तो टनों सोना खरीदने मेें बहुत सारी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है ऐसे में प्रधान मंत्री जी की अपील की हम सोना कम खरीदें बहुत मायने रखती है । देखते ही देखते पिछले कुछ सालों मेें भारत मेें सोने की दामों में जिस ढंग से तेजी आई है वह तो यूं भी हैरान करने वाली है उस पर भी भारतवासियों का सोना के प्रति प्यार कम नहीं हुआ है । सोना का भारत बहुत बड़ा बाजार है, यहां प्रतिदिन टनों सोना और चांदी का क्रय किया जाता है, शादी-ब्याह के सीजन मेें तो इसकी खपत और बढ़ जाती है । आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर घंटे करीब 80 किलो सोना खरीदा जाता है । भारत मेें होने वाली कोई भी शादी सोना या चांदी के गहनों के बना पूर्ण नहीं होती, तो जो आवश्यक हे, वह तो क्रय किया ही जाएगा पर एक वर्ग ऐसा भी है जो सोना को खरीद कर स्टाक कर लेता है, उसे सोना में मुनाफा दिखाई देता है । सोना कभी भी बेचा जा सकने वाला विनमिय होता है, दाम कम ज्यादा हो सकते हैं पर उसके नगदीकरण मेें कभी कोई संशय नहीं होता । जेसे ही भारत मेें सोना के दाम बढ़ने चालू हुए इसकी खपत भी बढ़ती चली गई और खपत बढ़ने का मतलब है कि लोगों ने इसे जमा करना शुरू कर दिया । खपत बढ़ी तो सोने का आयात बढ़ने लगा, सोने का आयात बढ़ा तो विदेशी मुद्रा भी खर्च होने लगी । ऐसे में प्रधानमंत्री जी की अपील कि एक वर्ष सोना न खरीदें विदेशी मुद्रा की बचत करने मेें मदद करेगी । सोने की खपत कम होने से भारत को संकट से निपटने मेें मदद मिलेगी । बताया जाता है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े ‘‘गोल्ड होल्उिंग’ देशा मेें माना जाता है । अनुमान के अनुसार भारतीय परिवारों मेें साथ ही श्रद्धा का केन्द्र रहने वाले मंदिरों मेें लगभग 25000 से 30000 टन सोने का स्टाक है । इतना स्टाक तो विश्व के कई देशों के पास सुरक्षित रखे सोने के भंडार का भी नहीं है । सोना तिजोरी के हवाले हो जाता है वह बाजार मेें नहीं आ पाता इसके लिए केन्द्र सरकार ने कई प्लान पहले से ही बनाए हुए हैं इनमेें सेवेरॉन गोल्ड बांड, गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम सहित अन्य डिजिटल स्कीम भी शामिल हैं । इन योजनाओं को लागू करते समय सरकार ने जो उम्मीद की थी वैसा निवेश इन में नही हुआ । दरअसल आम भारतीय सोना को सुरक्षित संपति मानता है, उसे लगता है कि जब कभी उसे जरूरत होगी तब वह सोना बेचकर अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता है इसलिए वह सोना क्रय तो करता हे पर उसे दोबारा बाजार मेें तब तक नहीं खपता जब तक उसे पैसों के इंतजाम की कोई अन्य व्यस्था होती दिखाई नहीं देती । आंकड़े बताते हें कि भारत में हर वर्ष लगभग 700 से 900 टन सोने की खपत होती है जो प्रतिदिन के आंकड़ों के हिसाब से 1920 किलो होता हे याने हर घंटे में 80 किलो सोना खरीदा जाता है । इस पर देश का खर्च 50 से 70 अरब डॉलर होता है मतलब 4.76 से 6.66 लाख करोड़ रूपए खर्च होते हैं । यदि भारतवासी एक साल सोना नहीं खरीदता तो सरकार को इतने लाख करोड़ विदेशी मुद्रा की बचत होगी । यदि पचास प्रतिशत की भी कमी आ जाती है तो देश को करीब 35 अरब डालर यानी 6.84 लाख करोड़ रूपए की बचत होगी । सरकार ने सोने के आयात पर लगने वाला शुल्क भी बढ़ा दिया है जिससे सोना और महंगा होगा । ऐसा ही कच्चे तेल की खपत कम होने से होगा । कच्चे तेल की खपत कम होने पर भी बड़ी विदेशी मुद्रा की बचत होने लगेगी । भारत कच्चे तेल को आयात करता है और लगभग 30 प्रतिशत विदेशी मुद्रा इस पर खर्च करता है । युद्ध के कारण तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, इससे विश्व के कई देशों में मंहगाई भी बढ़ रही है । सरकार को बड़ी विदेश मुद्रा इस पर खर्च करनी पड़ रही है, जाहिर है कि हमारे देश में सोना हो या तेल ईधन इनकी खपत कम होगी तो विदेशी मुद्रा भंडार भी कम नहीं होगा । आरबीआई के आंकड़े बताते हें कि फॅरेक्स रिजर्व 728 विलियन डॉलर है, वहीं ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 691 विलियन डॉलर है । इसे बनाये रखने की लिए समर्पण की आवश्यकता है । प्रधान मंत्री मोदी जी की अपील को विपक्ष जिस भी तरह से प्रस्तुत करे पर यह तो निश्चित ही है कि भारत के भविष्य के दृष्टिकोण से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है । प्रधानमंत्री जी के आव्हान के बाद इसकी प्रतिकियाओं ने भी तापक्रम बढ़ा दिया है । वैसे तो तापक्रम हाल ही मंेे हुए पांच विधान सभाओं चुनावों के नतीजों ने भी बढ़ाया हुआ है । बहुर्चिर्चत पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों मेें भाजपा को जिस तरह की सफलता मिली है वह आश्चर्यजनक है, हांलाकि आश्चर्यजनक तो नहीं कही जा सकती भाजपा ने पिछले एक साल मेें अपना पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल पर ही केन्द्रित कर के रखा था और चुनावों के दौरान भी भाजपा के सभी बड़े नेता प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित सभी केवल पष्चिम बंगाल पर ही चुनाव प्रचार में लगे हए थे । भजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं का बड़ा समूह चुनाव प्रचार में लगा रहा और वहां के मतदाताओं को ममताबनर्जी के असफलतओं के बारे में बताता रहा । एसआईआर से भी सबसे ज्यादा प्रभावित पश्चिम बंगाल ही हुआ था और वहां तो बहुत बड़ी संख्या मेें ऐसे वोटर भी थे जिनके बारे में फैसला चुनाव होने तक हो ही नहीं पाया । इसको लेकर ही टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी माननीय उच्च न्यायालय मेें अपील दायर करने पहुंच भी गई हैं । पश्चिम बंगाल मेें भाजपा ने दो सौ का आंकड़ा प्राप्त कर लिया वहीं टीएमसी सौ के आंकड़ों से दूर रही । मुख्यमंत्री के रूप मेें शुभेन्द्र अधिकारी ने अपना कार्यभार भी सम्हाल लिया और कड़े फैसले लेने शुरू भी कर दिए । पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता पाने का लगातार प्रयास करती रही है पर ममता बनर्जी को नहीं हरा पा रही थी इसका सबसे बड़ा कारण भाजपा बंगलादेशी अवैध वोटरों को मान कर चलती रही है इसलिए भी एसआइआर वहां कराया गया और माना जाता है कि करीब दो करोड़ वोटरों के नाम वहां से अलग किए गए । इनमें से ही करीब 27 लाख ऐसे वोटर थे जिनके बारे मेें चुनाव आयोग कोई फैसला नहीं ले पाया संभवतः उनके पास अपना परिचय प्रस्तुत करने के पर्याप्त दस्तावेज तो थे पर उनकी गहन जांच की प्रकिया पूरी ही नहीं हो सकी । यह मामला मतदान के पहले भी सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा था । ममता बनर्जी का आरोप है कि उनके वोटरों के नाम एसआइआर के नाम पर हटा दिए गए जिसका खामियाजा उनको उठाना पड़ा यहां तक कि ममता बनर्जी खुद भी भवानीपुर से अपना चुनाव हार गई । बताया जाता है कि वहां वे जितने वोटों से चुनाव हारी उससे अधिक वोट या तो काट दिए गए थे अथवा पेन्डिंग रखे गए थे । शुभेन्दु अधिकारी ने ही उन्हें चुनाव में पराजित किया जो एक समय ममता बनर्जी के खासमखास हुआ करते थे । ममता बनर्जी की केबिनेट के अधिकांश मंत्री चुनाव हार गए । यह विपक्ष के लिए भी बहुत बड़ा झटका है क्योंकि एक समय ममता बनर्जी को अजेय मानते हुए उन्हें इंडिया गठबंधन का अध्यक्ष बनाने तक की मांग की जाने लगी थी । वहीं तमिलनाडु में भारी उहापोह के बाद टीव्हीके प्रमुख विजयन ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली उनके पास बहुमत का आंकड़ा नहीं था जिसे जुटाने मे उन्हें समय लगा पर कां्रग्रेस सहित अन्य छोटे दलों ने उन्हें समर्थन देकर उनको सत्त की कुर्सी तक पहुंचा दिया पर देखना यह होगा कि गटबंधन की यह सरकार कितने दिनों तक काम कर पाती है हांलाकि उन्हें विधानसभा में अपना बहुमत प्राप्त करने मेें 144 विधायकों का समर्थन मिला । तमिलनाडु में फिल्मी दुनिया के अभिनेताओं को आम मतदाता सत्त की कुर्सी तक पहुंचाता रहा है । वहा कई अभिनेता राजनेता बनकर उभरे हे जिनमेें के. रामचन्द्रन से लेकर जयललिता का नाम भी आता है । असम मेें तो भाजपा की जीत सुनिष्चत मानी ही जा रही थी । असम मेें तीसरी बार भाजपा ने सत्ता हासिल की । वहीं केरल में कांग्रेस गठबंधन को विजय मिली पर वे अभी तक अपने नेता का चयन नहीं कर पा हैं हो सकता है आगामी दिनों मेें वे भी सत्ता की कुर्सी सम्हाल लेगें । भाजपा की चुनावी रणनीति ने क्षेत्रिय दलों को बहुत नुकसान पहुंचाया है और कई क्षेत्रीय दल अब सिमटते, सिकुड़ते और खत्म होते दिखाई देने लगे हैं । एक समय था जब राजनीति में क्षेत्रीय दल केन्द्र की सरकार का फैसला लेने की स्थिति मेें आ चुके थे आज वे अपने ही राज्यों में सिमटते और खत्म होते दिखाई देने लगे हैं । इसका फायदा आगामी दिनों मेें कांग्रेस को मिलेगा ऐसी संभावना व्यक्त की जाने लगी हैं । कांग्रेस न केवल पुरानी पार्टी है वरन पूरे देश में उसका अपना अस्तित्व भी बचा हुआ है भले ही वह अस्तित्व प्रतीकात्मक हो, क्षेत्रीय दलों के सिमटने के बाद वह प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में एक बार फिर सामने आ सकने की स्थिति में दिखाई देने लगी है । केरल मेें उसके गठबंधन की जीत जिसमें सबसे ज्यादा विधायक कांग्रेस के ही हैं याने वहां जो मुख्यमंत्री बनेगा वह कांग्रेस का ही होगा साथ ही तमिलनाडु मेें वह गठबंधन मेे आ ही चुकी है । भाजपा की रणनीति का फायदा कांग्रेस को मिलने लगा है । केन्द्र की राजनीति मेें क्षेत्रीय दलों की सिमटती भागीदारी का फायदा भी उसे ही मिलेगा । वैसे तो विधानसभा चुनावों में मिली सफलता का असर राज्यसभा में भी दिखाई देता है जहां भाजपा शनैः-शनैः बहुमत की ओर बढ़ रही है । भाजपा के पास लोकसभा में तो पर्याप्त बहुमत है पर राज्यसभा में बहुमत उसके पास नहीं है जिसके चलते वह कई विधेयकों को पारित नहीं करा पाती । अब वह राज्यसभा में भी बहुमत के करीब पहुंचती जा रही है ऐसे में उसे विधेयकों को पारित करना आसान हो जाएगा ।
प्रधानमंत्री की अपील ने बढ़ा तापक्रम
