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नारी

 नारी  नारायणी जगत में

 नारी ही जीवनदाता है।

 दर्द उसी के हिस्से में फिर

 ईश्वर यह क्योंकर आता है।

  माँ की सुन्दर ममता नारी

  नारी  ही प्यारी बहना है।

  सरस्वती की मूरत है वह

  कर्म लिए परहित बहना है।

   सारे त्याग उसी के हिस्से

   खु़शियांँ ही देना भाता है।

    घर को सुघर बना देती है

    वो तो केवल इक नारी है।

    सारा जीवन उसके हित ही

   उसनेे अपनी तो वारी है।

   मिला नहीं फिरभी उसको हक़

   पीड़ा से उसका नाता है।

  पति की सुन्दर सी काया की

  अर्द्ध अंग  वह कहलाती है ।

  तरह-तरह के उपक्रम करती

   उसका मन भी बहलाती है।

   दर्द उसी के हिस्से में फिर

   ईश्वर यह क्योंकर आता है।

डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’

दिल्ली

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