गर्मी पर दोहे : दुष्यंत कुमार
बढ़ रही है गर्मी, द्वार खड़ी है मौत। न जागे गर नींद से, मनाओगे रोज शोक।।१।। काट जंगल वनों को, बन गए खुद यमराज। फँसोगे अपने जाल में, वरना आ जाओ बाज।।२।। नौतपा में दिखी गर्मी, याद आ गयी नानी। पता चला इस दौर में, कितना उपयोगी पानी।।३।। जीव जन्तु भी मर रहे, खुद सराबोर…
