श्रीराम जीवन काव्य
विधा:-दुर्मिल सवैया छंदसुत कौशलया जब राम जने,भइयों मिल चार हुये तब थे।अवधेश मिटे सब कष्ट मिले, नगरी घृत दीप जले अब थे।दरबार बॅंटे उपहार प्रजा, सचिवों नृप के मन भी खुश थे।बजती ध्वनि नूपुर गान सुना, हिजड़ों निकसे मुख आशिष थे॥ ॲंगना सब बालक खेल रहे, खुश माँ उनकीं यह देख सभी।मन चैन मिटे मुख…
