Latest Updates

उन्माद कि जिजीविषा पर आहत होती जातिगत भावनाएँ…..

पंकज सीबी मिश्रा, राजनीतिक विश्लेषक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी

  आप याद कीजिए पिछले कुछ समय से हर नायक की जयंती, पुण्यतिथि पर कई बड़े सोशल मिडिया हैंडल और पेजो द्वारा लिखे गए अभद्र लेखों की भरमार होती है। देवी देवताओं के लिए लगातार अभद्र लिखा ही जा रहा है, कितना एक्शन ले पुलिस प्रसाशन । भगवान परशुराम, भगवान राम , ब्रह्मा, शिवलिंग, दुर्गा माता जैसे देव – आराध्य के लिए तो शिवाजी महाराज, महाराणा सांगा, चंद्रशेखर आजाद, सावरकर जैसे योद्धाओं के लिए भी उलूल जुलूल लिखा जा रहा है। ऐसा कर के इन लोगों को कौन सा सुख मिल रहा है, समझ नहीं आता।  इस विकृति पर रोक लगाना ही होगा। इतना तय है कि ऐसी गालीबाजी किसी भी जाति समाज के जिम्मेवार लोग नहीं करते। जो करते हैं उनके पास खोने के लिए अपना कुछ नहीं होता, पर उनकी लगाई आग बहुतों का घर जला देती है। ऐसों को कानून से ही रोका जा सकता है। यदि आप धार्मिक और राजनैतिक विषयों पर खुल कर अपना पक्ष रखते हैं तो आपको मुकदमों का सामना करना पड़ेगा। जेल भी हो सकती है, कई लोगो को हुई भी है, और एडवांस बेल भी लेना पड़ा है।  कुछ दिन पूर्व एक संत से सुना था, सोशल मिडिया अब शहर का बजबजाता नाला बन चुका है, जिसकी दुर्गन्ध गली मोहल्लों तक पसर चुकी है। वे जो नरपत को नफरत कह रहे, उन्हें अब हर बौद्धिक व्यक्ति महसूस कर रहा है। हर जाति के नाम से सैकड़ों पेज बने हुए हैं, और सबके पास हजारों लाखों फौलोवर हैं। सब जाति के नेता बने है और बड़े जातियों के नेताओं के बड़े – बड़े सोशल मिडिया पेज पेड मोड पर संचालित है। आज सैनी समाज के कार्यक्रम में, आज वैश्य समाज के कार्यक्रम में, आज निषाद समाज के कार्यक्रम में, आज कुशवाहा समाज के कार्यक्रम में, आज पटेल समाज के कार्यक्रम में, आज यादव समाज के कार्यक्रम में… बस ब्राह्मण समाज के कार्यक्रम में नेता जी नहीं जा सकते क्यूंकि इससे वैमनस्य्ता, जातिवाद, मनुवाद इत्यादि फ़ैल सकता है। ऐसे नेताओं का लक्ष्य यदि अपनी जाति का उत्थान होता तो अब तक आरक्षण और गरीबी जड़ से खत्म हो चुका होता , अपनी जाति के लोगों का सहयोग करना होता तो अब तक कोई भीख नहीं मांगता, क्या ही बात होती पर ऐसा है नहीं। उनका लक्ष्य केवल अराजकता फैलाना, ब्राह्मणवाद को गाली देना और निचली जातियों का वोट हासिल करना है । एक जाति के नाम से बना पेज दूसरी जाति को गाली दे रहा है, दूसरी जाति का पेज तीसरी जाति को… फिर उसके  बाद भी अगर आप सत्ता पक्ष ज्वाइन करेंगे तो यह मंत्र आप पर लागू हो जायेगा….
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभ्यन्तर: शुचि:।।
                      अलंकार अग्निहोत्री, गौतम खट्टर और अनिल त्रिपाठी के साथ जो हुआ वह गलत था , पर आश्चर्यजनक नहीं । गौतम सहित सभी जानते है कि उनके साथ ऐसा हो सकता है, और मुझे उम्मीद है कि वे इसके लिए तैयार भी रहे होंगे। लड़ाई वातानुकूलित कमरों में बैठ कर नहीं लड़ी जाती। उसके लिए कड़ी धूप में उतर कर अपनी चमड़ी जलानी पड़ती है। शत्रुओं के साथ साथ कई बार अपनों से भी उलझना पड़ता है। अनेकों भरम टूटते हैं, अनेकों साथी छूटते हैं, पर इन सब से विचलित हुए बिना लड़ते रहना होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गौतम ऐसा कर रहे हैं, ऐसा करेंगे। गौतम खट्टर ने जो बातें कहीं हैं, उनमें कुछ भी गलत या झूठ नहीं है। उसके ऐतिहासिक साक्ष्य हैं, गोवा का हर चौक गवाह है। बस आजादी के बाद हमने उसपर बात करनी बंद कर दी, जिसके कारण वे बातें अब नई, आश्चर्यजनक, और गलत लग रही हैं। यदि इस विषय पर लगातार बात हुई रहती तो शायद गौतम पर केस नहीं होता।पिछले दो दिन तक सोशल मिडिया में भगवान परशुराम को लेकर सैकड़ों आपत्तिजनक पोस्ट पड़ी है। यह देखना सचमुच दुःखद है। अलग अलग जातियों के नाम से बने पेज पर दिन भर अभद्र भाषा में लिखा गया है। कोई मौर्य पहचान के साथ तो कोई बौद्ध होने के दावे से लगातार छुट्टी गालियां दे रहे हैं। आजकल ठाकुर साहब नाम का पेज ब्राह्मणों को लेकर अभद्रता कर रहा है तो ब्राह्मण नाम के पेज से क्षत्रियों पर लांछन लगाए जा रहे हैं। इसी बीच कोई बहुजन पेज इन दोनों को गाली दे रहा है। सबकी रीच मिलियन में है, सबको हजारों लाइक मिले हुए हैं। सबकी कमाई हो रही और हम आप एक दूसरे के लिए बस कटुता पाल रहे। हालांकि यह जरूरी नहीं कि ब्राह्मण नाम का पेज सचमुच कोई ब्राह्मण ही चला रहा हो, ठाकुर साहब के चेहरे के पीछे छिपा व्यक्ति ठाकुर ही हो, या खुद को बौद्ध बताने वाला सचमुच बौद्ध ही हो… किस पेज को कौन चला रहा है, कहां बैठ कर चला रहा है, यह कोई नहीं जानता। बस नफरत बोई जा रही है, और मुर्ख युवक अपने ही भाइयों को गाली दिए जा रहे हैं। भगवान परशुराम और तुलसीदास और अम्बेडकर को लेकर कुछ वर्षों से शुरू हुआ एक नया चलन भी मुझे असहज करता है, वह है उन्हें बाबा, दादा कहना। किसी पूजनीय चरित्र को खींच कर जबरन अपने जातिवादी खांचे में फिट करना एक तरह से उनका अपमान ही है। यदि आपने उन्हें अपना जातीय प्रतीक घोषित नहीं किया होता, तो शायद वे आपके जातीय विरोधियों के निशाने पर भी नहीं होते। ऐसा भी नहीं कि ब्राह्मणों के पास अपनी जाति के नायकों की कमी हो। धर्म, इतिहास, विज्ञान, राजनीति, हर क्षेत्र में आपके पास सैकड़ों बड़े नाम हैं। क्या जरूरत है कि हम अपनी राजनीति के लिए देवतावों को नाम यूज करें? इससे उनके सम्मान में बृद्धि होती है क्या ? एक सोशल मिडिया पोस्ट के अनुसार गौतम खट्टर गिरफ्तार हुए हैं तो बेल भी मिलेगा। वे बिल्कुल अकेले हों, कमजोर हों, ऐसा भी नहीं है। उनके साथ लोग हैं, उनके लिए खड़े भी हैं और उन्हें सुरक्षित वापस ले आयेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। उनका जेल जाना भी उनको और बड़ा ही बनाएगा। इस बहाने यदि उस विषय पर देश भर में चर्चा हो जिसके कारण वे जेल गए हैं तो गौतम का जेल जाना सार्थक होगा।अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीयों पर अत्याचार कम तो नहीं हुए हैं। बर्बरता के मामले में वे हूणों मंगोलों से तनिक भी कम नहीं थे। उनके अत्याचारों पर लगातार बात होनी ही चाहिए। यदि एक वक्ता के जेल जाने से टूट कर हम उन विषयों पर बात करना छोड़ दें तो फिर क्या ही लड़ेंगे ? सरकारें कितने गौतमों को रोकेगी? सच को कितनी बार झुठलाया जाएगा ? गौतम की बात जिस कम्युनिटी को बुरी लग रही है, वे केस तो करेंगे। वे अपने अधिकारों को लेकर कुछ ज्यादा ही मुखर हैं और उनका सौभाग्य यह भी है कि सत्ता सदैव उनके साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करती रही है, उन्हें बल देती रही है।  हम आप अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा, अपने धर्म के विरुद्ध बोलने वालों पर केस नहीं करते तो यह हमारा दोष है।  एक बात और, सरकार सरकार होती है। उसे चुनें भले आप, पर वह सुनेगी सबकी। आप नाराज होइए, गाली दीजिए, पर इससे सत्य बदल नहीं जाएगा। तो स्वयं को भरम में रखने से बेहतर है कि सत्य को स्वीकार करें और उसी हिसाब से अपनी तैयारी करें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *