आधुनिक उर्दू साहित्य की सबसे प्रिय आवाजों में से एक, डॉ. बशीर बद्र के निधन से उर्दू कविता की दुनिया थोड़ी उदास-सी लग रही है। वे न केवल लाखों लोगों को छूने वाली रचनाओं का भंडार छोड़ गए हैं, बल्कि जीवन को हृदय के सरल लेकिन गहन नजरिए से देखने का एक अनूठा तरीका भी छोड़ गए हैं। हममें से जो लोग यदा-कदा हिंदी के मंचों उनकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए बड़े हुए हैं, या किन्हीं औरों हुए सुनते हुए, या शांत रातों में उनमें सुकून पाते थे, उनके लिए उनका जाना केवल एक जीवन का अंत नहीं, बल्कि उस दीपक का बुझना है जिसने अनगिनत लोगों को राह दिखाई है ।

अयोध्या में सैयद मोहम्मद बशीर के रूप में जन्मे, उन्होंने महज सात वर्ष की आयु में अपना पहला शेर रचा और 11 वर्ष की आयु में 1946 में इटावा के एक मुशायरे में अपनी पहली पूरी ग़ज़ल सुनाई। बचपन से ही उनके शब्दों में उनकी उम्र से कहीं अधिक परिपक्वता झलकती थी।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद, उन्होंने वहाँ और बाद में मेरठ कॉलेज में 17 वर्षों तक उर्दू पढ़ाया। मेरठ में बिताए उनके वर्ष उनके सबसे अधिक रचनात्मक वर्षों में से थे, जहाँ बद्र ने अपनी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ, संकलन, ग़ज़लें और साहित्यिक आलोचना की अन्य रचनाएँ प्रकाशित कीं।
फिर भी, मेरठ ने उनके दृढ़ संकल्प की भी कड़ी परीक्षा ली। 1987 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान, उनका घर और अनगिनत अप्रकाशित पांडुलिपियाँ जल गईं। वे भोपाल चले गए, जहाँ उन्हें नई जड़ें मिलीं और उनकी कलम को फिर से अपनी आवाज़ मिली। उनका दृढ़ संकल्प उनकी कविताओं में झलकता था – हानि, स्मृति और वह शांत आशा जो सब कुछ खो जाने के बाद भी बनी रहती है।
उनके मित्र, स्वर्गीय गोपीचंद नारंग ने याद किया कि बद्र के लिए, उनके पुस्तकालय का विनाश सबसे बड़ा नुकसान था। उर्दू विद्वान और आलोचक ने बताया कि वे यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि बद्र के मन में इसके लिए जिम्मेदार लोगों के प्रति कोई क्रोध नहीं था। उनके शब्द एक दरवेश के समान थे :-
तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के
हवा से पूछना दहलीज पे ये कौन जलता है
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझता
मुझे मालूम है किस्मत का लिखा भी बदलता है
एक और प्रसिद्ध दोहा, जो मेरठ में नुकसान के अपने अनुभवों से पैदा हुआ है, व्यक्तिगत दुख और व्यापक सामाजिक टिप्पणी दोनों रखता है। फिर भी यहां भी, कोई कड़वाहट नहीं है, केवल एक स्पष्ट उदासी है जो चिंतन की मांग करती है।
लोग टूट जाते हैं
एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते
बस्तियाँ जलाने में
बद्र को जो चीज़ अलग करती थी, वह थी दिल से सीधे बात करने की उनकी क्षमता, भारी शास्त्रीय अलंकरण को दरकिनार करते हुए जो कभी-कभी उर्दू कविता को रोजमर्रा के पाठकों से दूर कर देती है।
उनके समकालीन वसीम बरेलवी के लिए, बद्र एक पथ प्रदर्शक कवि थे। 1940 के दशक से, प्रगतिशील लेखक संघ के कवियों ने इस पारंपरिक शैली में क्रांति ला दी थी, इसे अपूर्ण प्रेम की अभिव्यक्ति से बदलकर सामाजिक न्याय, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्षों और मानवाधिकारों के लिए एक क्रांतिकारी साधन बना दिया था। उनके अनुसार, बद्र ने उर्दू ग़ज़ल की पुरानी रोमांटिक शैली को अपनाया, लेकिन नए मापदंडों के साथ। उन्होंने आम आदमी की भाषा और रोजमर्रा की जिंदगी की उपमाओं को चुना। उनकी कविता राजनीतिक या क्रांतिकारी नहीं थी, लेकिन समाज की विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक या यहाँ तक कि विडंबनापूर्ण भी हो सकती थी।
घरों के नाम थे,
नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया
कोई आदमी ना मिला
बरेलवी उन्हें एक महान नाज़िम या एंकर के रूप में भी याद करते हैं, जो प्रसिद्ध लेकिन कभी-कभी गुस्सैल कवियों और बेचैन श्रोताओं को सहजता और धैर्य से संभालते थे।
उर्दू भाषा पर अपनी महारत के लिए प्रसिद्ध बद्र , फारसी, हिंदी और अंग्रेजी में भी पारंगत थे। उनके संग्रह, जैसे ‘आस’, ‘आमद’, ‘आहट’, ‘इमेज’ और ‘उजाले अपनी यादों के’, सरल, रोजमर्रा की भाषा में गहरी भावनाओं को व्यक्त करने की उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं।
‘आस’ के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उसी वर्ष उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इन पुरस्कारों ने उस बात को मान्यता दी जो उनके पाठक लंबे समय से जानते थे: ये एक ऐसे कवि थे जिनके शब्द आधुनिक भारत की नब्ज़ को छू लेते थे।
बशीर बद्र की बात करते समय उनके सबसे प्रसिद्ध शेर का ज़िक्र किए बिना बात अधूरी है, वही शेर जिसके नाम पर ऑल इंडिया रेडियो का एक लोकप्रिय कार्यक्रम भी था:
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
जीवन के अंतिम क्षणों में इन पंक्तियों ने अनगिनत आत्माओं को सांत्वना दी है। ये कोमल आग्रह से कहती हैं कि अंधेरा छाने पर भी हम स्मृति के प्रकाश को थामे रहें। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने व्यक्तिगत हानि के क्षणों में इन शब्दों का सहारा लिया है, मैं कह सकता हूँ कि ये केवल सांत्वना ही नहीं देते; ये प्रकाश प्रदान करते हैं।
एक और शेर जो सामूहिक चेतना में समा गया है, जिसे अक्सर प्रेम और विश्वासघात की चर्चाओं में उद्धृत किया जाता है, वह है:
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता।
कितनी खूबसूरती से उन्होंने विरह के दर्द को मानवीय रूप दिया है। साहित्यिक जगत तक, अग्नि और नवजीवन के माध्यम से, बशीर बद्र की यात्रा उस लचीलेपन को दर्शाती है जिसका उन्होंने अपनी कविता में गुणगान किया। उनके लेखन में आरोप-प्रत्यारोप की जगह एक गहरी समझ है। उनका सुझाव है कि जीवन की विवशताएँ हम सभी को आकार देती हैं। यह सहानुभूति उनकी अधिकांश रचनाओं में झलकती है, जिससे उनकी कविताएँ निर्णय की दीवार के बजाय दिलों के बीच एक सेतु बन जाती हैं। उनकी राजनीतिक जागरूकता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 1972 के शिमला समझौते के दौरान उन्होंने लिखा था :-
दुश्मनी जम कर करो
लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ
तो शर्मिंदा ना हो
विवादित विचारधाराओं से परे कई नेताओं ने जब-तब उनकी इन पंक्तियों का उद्धरण दिया है। जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर भारतीय सांसदों तक, उनके शब्द सीमाओं से परे थे क्योंकि वे एक साझा मानवता की बात करते थे। वे मानवता के सच्चे हिमायती थे।
बद्र की प्रतिभा जटिल भावनाओं को सरल और सुलभ दोहों में ढालने में निहित थी। प्रेम की शांत शक्ति पर इस चिंतन पर विचार कीजिए:
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुद्र नहीं देखा
(प्रेमी आँखों में तो रहता है, पर हृदय में उतर कर उतना गहरा नहीं उतरता जितना गहरा भाव। जैसे कोई नाविक सागर की विशालता को कभी देख ही नहीं पाता।)
यहाँ एक दार्शनिक शांति है, जो एक ओर प्रेम की सीमाओं की स्वीकृति है वहीँ दूसरी ओर अत्यंत परिपक्व प्रतीत होती दिखाई पड़ती है। सलीकेदार लचीलेपन और बोध पर यह दोहा देखिए :-
सिर झुकाओगे तो
पत्थर भी देवता हो जाएगा
उन्होंने शक्ति और श्रद्धा के मनोविज्ञान को कितनी कुशलता से पकड़ा है। उनके शेरों में अक्सर अवलोकन और सौम्य व्यंग्य का मिश्रण होता है, जो पाठकों को दुनिया को नए सिरे से देखने के लिए आमंत्रित करता है।
उनकी प्रेम भरी ग़ज़लें, जो लालसा, विरह की पीड़ा और क्षणिक मिलन के आनंद को दर्शाती हैं, वे कालातीत हैं और विशेष रूप से युवाओं को प्रभावित करती हैं। उन्होंने प्रेम को एक भव्य त्रासदी के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के उस चमत्कार के रूप में चित्रित किया है। उनकी रचनाएँ छोटी-छोटी रोशनी के रूप में जो जीवन को सहनीय बनाती हैं।
अपनी कविता के अलावा, बद्र ने एक आलोचक के रूप में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला’ जैसी रचनाओं और 20वीं सदी की ग़ज़ल पर किए गए अध्ययनों ने ग़ज़ल के विकास की विद्वतापूर्ण समझ को आकार देने में मदद की। उन्होंने बिहार उर्दू अकादमी की अध्यक्षता की और उम्र बढ़ने के बावजूद अनेक साहित्यिक संस्थानों से जुड़े रहे। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, मनोभ्रंश ने उन्हें चुनौती दी, जिससे धीरे-धीरे उनकी यादें धुंधली पड़ने लगीं जो कभी उनकी कविताओं में सहजता से बहती थीं।
अयोध्या की गलियों से भारत के साहित्यिक जगत तक, अग्नि और नवजीवन के माध्यम से, बशीर बद्र की यात्रा उस लचीलेपन को दर्शाती है जिसका उन्होंने अपनी कविता में गुणगान किया।
नमाज़-ए-जनाज़ा अदा कर दी गई है, और वे भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में विश्राम कर रहे हैं। फिर भी, उनका सच्चा विश्राम स्थान उन्हें पढ़ने वालों के दिलों में बना रहेगा। हम उन्हें निराशा के साथ नहीं, बल्कि कृतज्ञता के साथ विदाई देते हैं। जिस कवि ने हमें उजाले थामे रखना सिखाया, वह स्वयं उजाले बन गए हैं। अलविदा, बशीर साहब। शाम ढलने के बहुत बाद भी आपके शेर हमारा साथ देते रहेंगे। और आखिर में बशीर बद्र के कुछेक शेर उनको याद करते हुए :-
यूं ही बे-सबब न फिरा करो,
कोई शाम घर में रहा करो
कोई हाथ भी ना मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है,
जरा फासले से मिला करो
अजीब शख्स है नाराज हो के हंसता है,
मैं चाहता हूं खफा हूं तो वो खफा ही लगे
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिसकी तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।
डॉ. मनोज कुमार
लेखक – जिला सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी हैं।
