राजनीतिक सफरनामा : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव
युद्ध और चुनाव, भारत की जनता इस समय इन दोनों के मध्य झूल रही है । चुनाव तो युद्ध जैसे हालत ले ही लेते हैं पर युद्ध चुनाव जेसे हालात नहीं ले पाता । कहने को तो अमेरिका और ईरान के बीच ‘सीजफायर’ जैसा कुछ हो गया है पर रिपोर्ट बता रही हें क जमीनी धरातल पर ऐसा कुछ नहीं हुआ है । सायरन बज रहे हैं और बम गिर रहे हैं । जिस रात को सीजफायर हुआ उस रात को तो ऐसा लग रहा था कि महायुद्ध होने वाला है । अमेरिकी राष्ट्रपति ने तो गुस्से से तिलमिलाते हुए कह दिया था कि ‘‘आज रात एक सभ्यता नष्ट होने वाली है’’ । विश्व के लोग टेलीविजन खोले इंतजार कर रहे थे तभी ब्रेकिंग चलने लगी की सीजफायर हो गया है । संभवतः लोगों ने राहत की सांस ली होगी । यूं तो रूस और यूक्रेन का युद्ध तीन सालों से चल रहा है और कब तक चलेगा किसी को कोई मतलब है भी नहीं, पर ईरान अमेरिका के युद्ध में आम लोगों में भी दिलचस्पी है कारण साफ है तेल, गेस और इधन जो आम लागों से सीधा जुड़ा हुआ मसला है । एक माह में ही भारत सहित विश्व के कई देश तेल, गेस संकट से परेशान हो चुके हें, कई देशों मे इनकी कीतें ीी बढ़ चुकी हैं और यह भी तय नहीं हो पाता कि वह मिल ही जाएगा । जब परेशान आम आदमी होने लगता है तो वह दिलचस्पी भी लेने लगता है और संकट से उबरने के लिए प्रार्थना भी करने लगता है । ईरान के नए प्रमुख ने सबसे पहले ही उस रास्ते को बंद किया जिस रास्ते से कइ्र देशों के जहाज तेल, गैस लेकर गुजरते थे । वह सामुद्रिक मार्ग ईरान के अधिकार क्षेत्र में है । ईरान जानता था कि वह अमेरिका से जीत नहीं सकता, दूसरे अन्य देश भी अमेरिका की मदद करने मजबूर हो जाएगें, तब फिर उसका युद्ध में जीतना असंभव ही हो जाएगा तो उसने विश्व के कई देशों को परेशान करना शुरू कर दिया, जहां-जहां अमेरिका के सैन्य कैंप थे उन पर भी हमला किया और हार्मुज के जिस सामुद्रिक रास्ते से होकर जहाज गुजरते थे उसको भी बंद कर दिया । इससे ईरान को फायदा ही हुआ । अमेरिका उन देशों की रक्षा नहीं कर पाया जहां उसने अपनी सेना के लिए बेसकैंप बना रखे थे । वे देश तो अनावश्यक ही बमों की चपेट में आने लगे । दूसरे वे देश जो अमेरिका की मदद करते भी तो वे भी ईरान के हमलों से भयभीत हो गए । कोई भी देश अपने देश की शांति को भंग नहीं करना चाहेगा । अमेरिका को नाटो पर पूरा भरोसा था । नाटो ऐसा संगठन है जो अपने सदस्य देशों की सैन्य मदद करने के लिए ही बना है । अमेरिका नाटो का सबसे प्रभावशाली देश है तो अमंरिका को भी लगा कि था कि नाटो के सदस्य देश उसकी मदद करने को आगे आ जायेंगें, पर कोई देश अमेरिका की मदद करने नहीं आया बल्कि उन्होने तो साफ ही मना कर दिया । नाटो देशों का मना करने का कारण ईरान की वह रणनीति ही मानी जा सकती है जिसके तहत उसने अमेरिका के बैस कैंप वाले देशों में बम बरसाए थे और दूसरे हामुज बंद होने से भी नाटो देशा भयभीत हुए । तेल, गैस और ईधन के बिना आम नागरिक की दिनचर्या गड़बड़ा जाती है दूसरे मंहगाई बढ़ने का भी खतरा रहता है । नाटो देशा के साफ मना कर देने से अमंरिका अकेला पड़ गया, अमंरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सभी को भला बुरा भी कहा जो जायज था । अमंरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायल की बातों में आकर युद्ध तो छेड़ दिया पर युद्ध में वह नुकसान में ही रहा । कहां तो उसे लग रहा था कि ईरान जरा सा देश है तो दो-तीन दिनों में ही उसे निपटा देगें, पर ईरान ने हार ही मानी, वह बराबरी से युद्ध लड़ता रहा । उसके बड़े नेता, बड़े अधिकारी सभी मारे जाते रहे पर युद्ध जारी रहा । ईरान ने युद्ध की पूरी योजना पहले से ही बना कर रखी थी । वह जानता था कि अमेंरिका इजरायल के कहने पर उस पर हमला जरूर करेगा, तो उन्होने ऐसी रणनीति बनाई कि अमेंरिका का भी सिर चकरा गया । वह सीजफायर के लिए दबाव बनाता रहा और अंत में सीजफायर करा ही लिया । पर ईरान झुका ही नहीं, अभी भी सीजफायर कब तक चलेगा कोई नहीं जानता । लोगों को उम्मीद है कि जल्दी ही फिर से युद्ध प्रांरभ हो जाएगा । ईरान सतर्क भी है और तैयार भी । सीजफायर का श्रेय पाकिस्तान और चीन को मिला । पाकिस्तान तो खुद इस सिथति में नहीं है कि वो अपने देश को सम्हाल पाए पर ईरान और अमेरिका के बीच हुए सीजॅायर का श्रेय उससे मिलने लगा । खुद अमंरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बताया कि सीजफायर में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही । पाकिस्तान गद्गद हो गया पर उसकी यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं रह सकीं । इजरायल ने पाकिस्तान की करतूत के समीकरण को समझ लिया । इसलिए इजरायली प्रणानमंत्री ने पाकिस्तान को भी धमकी दे दी । चीन अपना काम करने के बाद खामोश हो गया पर पाकिस्तान को तो जैसे धमकी ही दे दी । इजरायल की धमकी का मतलब है कि पाकिस्तान को सबक सिखाना । पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी अमेरिका के प्रिय बने हए हैं । मुनीर को अमंरिकी राष्ट्रपति ट्रंप सीधा फोन लगाते हैं और काम का बोल देते हैं वो काम मुनीर को करना ही पड़ता है । दुनिया के मुस्लिम देशों को एकजुट करने के प्रयास पाकिस्तान की रणनीति के कारण ही नहीं हो पा रहे हैं । पाकिस्तान अब इजरायल के टारगेट में आ चुका है तो निश्चित ही देरअबेर पाकिस्तान को हमले झेलने के लिए तैयार रहना होगा । वैसे भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तना-तनी चल ही रही है,लगभग रोज ही बार्डर पर गोलाबारूद बरसाए जा रहे हैं । एक दो बार तो पाकिस्तान अफगानिस्तान के अंदर घुस कर हमला कर आया है । इस तनातनी के बीच इजरायल की धमकी भी आ गई है तो पाकिस्तान के होश फाख्ता तो होना ही थे । बहरहाल ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर तो चल ही रहा है पर इजरायल और लेबनान के बीच युद्ध जारी है । इजरायल तो साफ कह रहा है कि सीजफायर के दायरे में लेबनान नहीं है इसलिए उस पर हमले जारी रहेगें और इरान का कहना है कि सीजफायर का मतलब सीजफायर याने लेबनान पर भी हमले बंद होने चाहिए । भारत में चुनाव रूपी युद्ध भी चल रहे हैं । आरोप-प्रत्यारोप और देख लेने की धमकी यह सब कुछ चुनावों में होने लगा है । कभी केवल विकास के नाम पर और भविष्य कर योजनाओं के नाम पर वोट मांगा जाता था पर अब पैटर्न बदल चुका है अब व्यक्तिगत आरोप भी लगाए जाते हैं और देख लेने की धमकी ीी दी जाती है । असम के मुख्यमंत्री जैसे बीच चुनाव में ही एफआईआर भी दर्ज करा कर पुलिस को भेज दिया जाता है । कांग्रेस नेता खड़गे और कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा पर बकायदा एफआईआर हे चुकी है और पवन खेड़ा को अरेस्ट करने असम पुलिस उनके दिल्ली स्थित घर पर छानबीन भी कर चुकी है । पवन खेड़ा को गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत लेनी पड़ी है । भाजपा का मुख्य टारगेट तो पश्चिम बंगाल ही है जहां वे ममता बनर्जी को घेर रहे हैं । ममता बनर्जी अकेली भाजपा के साथ मुकाबला भी कर रहीं हैं । भाजपा को उम्मीद है कि वे इस बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने में सफल हो जायेगें । पिछले तीन चुनावों से भाजपा पश्चिमबंगाल में जीतोड़ मेहनत कर रही है और ममता बनर्जी की ही पार्टी के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर उन्हें ही ममता बनर्जी के सामने खड़ा कर रही है । शुभेन्द्रु अधिकारी कभी ममता बनर्जी के खासमखास हुआ करते थे । उनके परिवार के कई सदस्य राज्यसभा, लोकसभा से लेकर अन्य जगह जमे हुए थे । भाजपा ने शुभेन्द्र अधिकारी को अपनी पार्टी में लिया और अब उनको ही ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार भी दिया । पिछले चुनाव में भी वे ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़े थे और जीत भी गए थे । ममता बनर्जी पिछले चुनाव में दो विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ी थीं एक में हार गई थीं पर दूसरी सीट से जीत गई थीं । पर इस बार ममता बनर्जी केवल एक ही सीट भवानापुरा से चुनाव लड़ रहीं हैं जहां उनके खिलाफ शुभेन्द्र अधिकारी भाजपा प्रत्याशी हैं । भाजपा पूरी तरह भवनापुर पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए है क्योंकि इस बार भवानीपुर से ममता बनर्जी के हार जाने का मतलब हार जाना ही होगा । भाजपा के बड़े-बड़े नेता इस सीट पर प्रचार कर रहे हैं । पूरी विधानसभा को कई सेक्टरों ें बांट दिया गया है और हर सेक्टर पर केन्दी्रय मंत्री, सांसद या संगठन के बड़े नेता तो जिम्मेदारी सौंपी गई है । शुभेन्द्रु अधिकारी का नामांकन कराने खुद गुहमंत्री अमितशाह पहुंचे इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा किस रणनीति के साथ चुनाव लड़ रही है । प्रधानमंत्री की भी लगतार सभाएं हो रहीं हें और कई मुख्यमंत्री भी सभाएं कर रहे हैं । हिन्दुओं का वोट पाने के लिए उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी भी प्रचार करने में लगे हुए हैं । बबारी मस्जिद बनाने के चक्कर में सुर्खियों में आए हुमांयु कबीर की नई नवेली पार्टी भी चुनाव लड़ रही है पर एक वीडियो सामने आने के बाद वे बेकफुट पर जाते दिख रहे हें । दरअसल इस वीडियों में हुमायं कबीर अपनी ही समाज के और समर्थकों के बारे में गलत बोलते दिखाई दे रहे हें यहं तक कि वे बाबरी मस्जिद बनाने को लेकर भी टिप्पणी करते दिख रहे हैं । वे भाजपा द्वारा उन्हें एक बड़ी राशि देने की बात भी कर रहे हें । वीडियों कितना सही है यह तो नहीं कहा जा सकता पर इससे सियासी हलचल जरूर तेज हो गई है, टीएमसी इस वीडियों को अपने प्रचार में उपयोग करने लगी है । इस वीडियों के मसाने आने के बाद एआइएएम ने उनके साथ जो गठबंधन किया था उसे खत्म कर लिया है और हुमायं कबीर भी बेकफुट पर जाते दिखाई दे रहे हैं, यह टीएमसी के लिए फायदेमंद बात है, क्योंकि टीएमसी मुस्लिम वोटों के बल पर ही अपने प्रत्याशियों को जिताती रही है और हुमायं कबीर के सामने आ जाने के बाद यह लगने लगा था कि अब मुस्लिम वोट हुमांय कबीर की पार्टी को ही जएगा जिसका सीधा असर टीएमसी पर पड़ता । भाजपा पूरी तरह हिन्दु वोटों पर निर्भर है और टीएमसी लगभग मुस्लिम वोटों पर । पिछले चुनाव में भाजपा ने जो 77 विधानसभा सीटें जीती थीं उससे उन्हें उम्मी बंधी हे कि वे इस बार उससे बेहतर प्रदर्शन करने वाले है । ममता बनर्जी के लिए एसआईआर भी अवरोध पैदा करेगा । चुनाव आयोग ने बड़ी संख्या में वोटर को विभिन्न कारणों से अलग कर दिया है और बहुत सारे वोटरो ं के नाम अब भी पेंडिंग स्थिति में है । यह बताया जा रहा है कि जो वोटर अलग हुए हें वे ममता बनर्जी के समर्थक वोटर ही थे, जाहिर है कि इसका प्रभाव तो ममता बनर्जी को पड़ेगा हालांंकि ममता बनर्जी भी इस बात को समझ रही हें इसलिए ही वे पूरी ताकत के साथ एसआइआर का विरोध करती रहीं हैं और अभी भी कर ही रहीं हें, वे माननीय उच्च न्यायालय में स्वंय ही पैरवी करने पहुंच गई थीं । वैसे उनके इस विरोध को कोई लाभ उनको फिलहाल मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है । चुनाव आयोग को जो करना है वह कर रहा है और वो जो कर रहा है उसका नुकसान टीएमसी को उठाना पड़ ही रहा है और यह चुनाव परिणामों को भी प्रभावित करेगा यह भी लगभग तय ही है । असम और केरल में मतदान हो चुका है । दोनों जगह लगभग 90 प्रतिशत वोटिंग हुई । ऐसा माना जा रहा है कि जो डेड वोटें थीं उनके नाम अलग हो जाने से वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है । असम में कांग्रेस ने जी जान से मेहनत की और उसे लग रहा है कि अधिक मतदान होने का फायदा उसे मिलने वाला है वहीं केरल में सत्तारढ़ दल भी ऐसा ही सोच रहा है । भाजपा को पिछले चुनाव में केरल में दो प्रतिशत मत मिले थे, उसे उम्मीद है कि इस बार उसे लगभग बीस प्रतिशत वोट मिलने वाले है जो वर्तमान के लिए भले ही बेहतर न लगे पर भविष्य के दृष्टिकोण से शुभ संकेत हैं तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल में अभी मतदान होना है । परिणाम तो चार मई को ही आयेगें पर भाजपा जिस तरह से उत्साहित और आत्मविश्वास से भरी दिख रही है उससे परिणाम के बारे में कयास लगाने में आसानी हो रही है ।
युद्ध और चुनाव के बीच कयासों का दौर
