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पंचम सिंह पुराणिया (पांचाल) की 2 रचना एवं परिचय

हाय ! बुढ़ापाजरा जोर की गति से, सब अंग हाल बेहाल ।शिथिल हुआ तन फिर भी, मन की चंचल चाल । ।इंद्रिया सभी थकित हो गई, रहती ममद की चाह ।लाठी लेकर बाहर जावे, तब ही चल पावें राह । बधिर यंत्र कानों में हैं, ऐनक नयनन मॉंहि ।नकली बत्तीसी है मुंह में, असली दन्तावली…

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‘आप’ ने गवां दी सत्ता : कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

अंततः  आप पार्टी दिल्ली का चुनाव हार ही गई………बहुत लोगों ने बहुत सालों से ऐसा दिन देखने के लिए बहुत सारे सपने देखे थे । पिछले चुनाव में आप पार्टी को जिस तरह से 67 सीटें मिलीं थीं उसे देखकर यह अंदाज लगा पाना कठिन था कि आप पार्टी इस चुनाव में इतनी बुरी तरह…

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मेरे ज़रूरी काम

जिस रास्ते जाना नहीं हर राही से उस रास्ते के बारे में पूछता जाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। जिस घर का स्थापत्य पसंद नहीं उस घर के दरवाज़े की घंटी बजाता हूँ। मैं अपनी अहमियत ऐसे ही बढ़ाता हूँ। कभी जो मैं करता हूं वह बेहतरीन है वही कोई और करे…

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(अंबेडकर जयंती विशेष)

“लोकतांत्रिक भारत: हमारा कर्तव्य, हमारी जिम्मेवारी” जनतंत्र की जान: सजग नागरिक और सतत भागीदारी लोकतंत्र केवल अधिकारों का मंच नहीं, बल्कि नागरिकों के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का साझेधार भी है। भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका केवल वोट देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें न्याय, समानता, संवाद, स्वच्छता, कर…

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मुंबई का ठाकरे और हिंदुत्व का शूटआउट !

मुंबई में शूटआउट शब्द बड़ा प्रसिद्ध है । ये शूटआउट शब्द निश्चित रूप से आपने बॉलीवुड फिल्मों में सुना होगा किन्तु जब बाला साहब ठाकरे नाम का दिग्गज मुंबई में राज करता था तब हिंदुत्व का ध्वज महाराष्ट्र के आसमान पर सबसे ऊंचाई पर लहराता था और शूटआउट शब्द केवल माहौल बिगाड़ने वाले के लिए…

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तेरी रचना का ही अंत हो न

(कविता मल्होत्रा) कैसी विडँबना है, हर कोई अपनी-अपनी स्वार्थ सिद्धि की चाहत लिए अपना स्वतंत्र आकाश चाहता था और आज अधिकांश लोगों को दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं हो रही। अभिव्यक्ति की आज़ादी वाले देश में तमाम सीमाएँ लाँघने वाली समूची अवाम का अपनी भाषा पर ही अधिकार नहीं रहा, जो निशब्द होकर कोष्ठकों…

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चेहरा उसका शगुफ़्ता सा गुलाब लगे है…

चेहरा उसका शगुफ़्ता सा गुलाब लगे है उजली शब का वो मुनव्वर माहताब लगे है l जब भी देखा है उसे तारीकियों से लड़ते वो फ़लक पर इक चमकता आफताब लगे है l क्या करें तारीफ़ हम उस जल्व ए जाना की सिर से पाँ तक जो ग़ज़ल की इक क़िताब लगे है l सब…

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भ्रष्टाचार का बोलबाला फिर भी सच्चाई का मुंह काला !

कई राजनीतिक आत्माओं के साथ सोशल मीडिया पर हूं कुछ तो सलाह भी लेते है पर अवसर पर पहचानने तक से मुकर जाते है और कुछ लोगो के संपर्क में भी रहता हूं जिन्हे कलम के माध्यम से आप सबके बीच लाने की जिज्ञासा भी है । धन धर्म और सुकर्म से समाज सेवा करने…

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सावधान सावधान वोटर मौन है ! -कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

चुनाव चल रहे हैं भले ही केवल दो राज्यों के चनाव हों पर माहौल वैसा ही है, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप वाला । वैसे ऐसी अंत्याक्षरी न हो तो मजा भी नहीं आता, हमें भी आदत सी बन गई है । चुनाव घोषित होने के पहले ‘‘तू चल मैं आया’’ वाले आवागमन को देखने की…

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करोना को सोच के खुद को ना भूले !

अति बौद्धिकवाद एजेंडा धारी दर्शन भी आतंक का ही रूप स्वरूप है। मात्र आलोचना या वादी प्रतिवादी को ही विद्वता नहीं कहते । इसके लिए आदमी के पास व्यवहारिक ज्ञान के साथ सम्यक व्यवहार होना नितांत अनिवार्य है। अब समय आ गया है ,  मजदूरों का रोना रोना बंद कर दीजिये  , मजदूर घर पहुंच…

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