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बैसाख़ी के फिर मेले हों

श्रीमती कविता मल्होत्रा इतिहास गवाह है कि जहाँ रूह सहमत होती है वहीं रब की रहमत होती है।किसी भी तरह की अनहोनी का अंदेशा सबसे पहले अपनी ही रूह को होता है।ये और बात है कि मानव की चेतना अपने ही चैतन्य के इशारे को नज़रअंदाज़ कर देती है।यूँ तो मानव की पहुँच चाँद तक…

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बनें रब का सेवादार

कविता मल्होत्रा (संरक्षक, स्तंभकार) “माता-पिता केवल शब्द नहीं ये जीवन का हैं सार ईश्वरीय श्रवण कुमार वही जो सृष्टि का सेवादार” शिक्षा के क्षेत्र में अनेक प्रकार की संभावनाएँ होती हैं जो किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व को तराश कर एक सुघड़ आकार देतीं हैं।हर व्यक्ति की पसंद अलग होती है।अपनी पसंद के अनुसार हर…

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सिसकते मानव अंश

शहर का सारा कूड़ा एक बड़े सुनसान इलाके में इकट्ठा किया जाता है। जहां कूड़े के पहाड़ बन गए हैं। उसी कूड़े में पड़े हुए कुछ मानव भ्रूण सिसक रहे हैं। एक दूसरे से बात करके अपना मन कुछ हल्का कर रहे हैं। एक कन्या भ्रूण दूसरी कन्या भ्रूण से बात करते हुए कहती है…

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पर्यावरणीय गीत- प्रदूषण का नंगा दानव

लाल बिहारी लाल प्रदूषण का नंगा दानव नाच रहा है दुनिया मेंइस दानव को रोको वरना आग लगेगी दुनिया मेंप्रदूषण का नंगा दानव…….. रो रही है धरती मैया, रो रहा आसमान हैवन धरा से सिमट रहे है, मिट रही पहचान हैमीठा जहर नित घूल रहा है स्वच्छ निर्मल पनिया मेंप्रदूषण का नंगा दानव…….. जल,थल पवन और गगन सभी…

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“हम क्या करें”

चुग रहे थे हम गुल हाथ में चुभा कांटा गिरा साजी से फूल    थी  मेरी  ही भूल      हम क्या करें थे खयालों में मशगूल। उठा ज़मीं से धूल चेहरा हो गया धुले-धूल      हम क्या करें। बच कर थे हम चल रहे हौसला से थे हम बढ़ रहे बिछा था पग-पग पर शूल…

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माँ

सोनाली सिंघल समुंदर की गहराई माँ के आँचल की लंबाई कभी नापने की कोशिश मत करना जीवन बीत जाएगा पर तू नही जीत पाएगा… कल नहीं बिना कुछ किए ये ज़िंदगी मिल सकती है उसका फल नहीं अपने आज को आज ही जी सकते हो कल नहीं, खुवाइशो को कम करो चुनिंदा के लिए होसले…

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धीरे – धीरे हम भारतीय संस्कृति को स्वयं नष्ट करते जा रहे..!

ग्रामीण क्षेत्रों में माहौल बदल रहा और अब आधुनिकता के नाम पर जो कुसंस्कृति कभी शहरों की पहचान मानी जाती थी अब गांवों में पैर पसार चुकी है । आधुनिकता के नाम पर जमकर अश्लिलिता परोसी जा रही और इसका लुत्फ घर के सभी सदस्य उठा रहें । अगर बात करें शादी विवाह में बढ़ते…

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उसका बचपन

(सुमन नागर) सुबह उठते ही उसका काम शुरू होता है प्यार और दुलार से उसका दूर तक वास्ता नहीं होता है। होता है वो रोज ट्रैफिक सिग्नल्स पर हाथ में कभी पोछा कभी बेचने का कुछ सामान होता है। क्या कभी सोचा है क्यों उसका बचपन ऐसे सड़को पर बीत रहा है? क्यों नहीं वो…

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डॉ.राहुल का सम्मान

साहित्य मंडल, श्रीनाथद्वारा (राजस्थान) में पूज्य आचार्य भगवतीप्रसाद देवपुरा की 10 पुण्यतिथि के उपलक्ष्य  में आयोजित भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.राहुल को  06 जनवरी 2024 को प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। उत्तर  प्रदेश  हिन्दी  संस्थान, लखनऊ  और हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कार प्राप्त डॉ.राहुल एक ख्याति-प्राप्त आलोचक-कवि हैं।अबतक इनकी 80 पुस्तकें प्रकाशित …

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बदलना है तो खुद को बदलो

हमारे आस पास कुछ न कुछ ऐसा घटता ही रहता है जो हमें पसंद नहीं आता है। ऐसे लोगों से मुलाकात होती ही रहती है जिनकी हरकतें हमें विचलित कर देती हैं। ऐसे लोगों की वाणी, विचार और कर्म केवल दुख ही देते हैं। तब अनायास ही मन में यह विचार आता है कि कितना…

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