“कलबूत” – वंदना गर्ग
अरे वाह! आ गई आपवेलकम! वेलकम!कुशन की टेक लगाकर आराम से बैठीऐ (मनोवैज्ञानिक ने मुस्कुराते हुए आदर भाव से कहा)मैं चाय वाय का इंतजाम करती हूं, मौसम भी अच्छा हुआ है,सच्च पूछो तो मॉनसून की बात ही अलग होती है, है ना!क्या कहती हैं आप?हां बिलकुल , ठीक कहा!हर मौसम का लुत्फ ही अलग होता…
