जिसमें शामिल ज़मीं की धूल नहीं वो बुलंदी हमें क़ुबूल नहीं
जिसमें शामिल ज़मीं की धूल नहीं वो बुलंदी हमें क़ुबूल नहीं तीरगी बादलों की साजिश है चाँद की इसमें कोई भूल नहीं मुझपे तारी जमूद बरसों से एक मिसरे का भी नुज़ूल नहीं तू मुझे जब भी चाहे ठुकरा दे देख इतनी भी मैं फ़िज़ूल नहीं ग़म समेटे है सारी दुनिया का दिल हमारा मगर…
