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कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ

कितनी कड़वी हैं सच्चाइयाँ गिर रहीं नीचे ऊँचाइयाँ कोयलों के बाइक कंठस्वर चढ़ी नीलाम अमराइयाँ  बद हुये मौसमों के चलन हुयीं गुमराह पुरवाइयाँ  दिन ढले घर में अहसास के स्यापा करती हैं तनहाइयाँ आदमी कद में बकमतर हुआ बढ़ गयीं उसकी परछाइयाँ गिरना तय है जिधर जायेंगे उधर खंदक इधर खाइयाँ होश आयेगा ‘महरूम’ जब…

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दुर्घटना पीड़ितों के लिए “कैशलेस” उपचार : नीयत नेक, व्यवस्था बेकार

इस देश में जब कोई सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त होता है, तो सबसे पहले यह नहीं पूछा जाता कि ज़ख्म कितना गहरा है — पहले यह पूछा जाता है कि “पहचान पत्र है?”, “बीमा है?”, “अस्पताल पंजीकृत है?” और फिर अंत में — “बचा पाएँगे या नहीं?”। मानो पीड़ित की जान से पहले कागज़ ज़रूरी हो।…

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आज दिल जीते हैं, कल फिर कप जीतेंगे।

जन्म मरण के चक्र-सी है, हार जीत लग रही। लड़े-भिड़े शौर्य से, आज नही तो कल सही।। कप जितने से बड़ी बात दिल जीतना होता है। क्रिकेट खत्म नही हो गया। 46 दिन में 45 दिन आप जीते हो। हमारी भारतीय टीम ने 2023 वर्ल्ड कप के अंदर 10 मैच जीते और आज फाइनल हारने…

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है विजयी जो साँसारिक चुनौतियों से हारा नहीं कौन है जिस हृदय में मन्दिर और गुरुद्वारा नहीं

प्रकृति ने सँपूर्ण सृष्टि को समान रूप से अपने तत्व देकर गढ़ा है। अब ये तो मानव जाति पर निर्भर करता है कि वो किस परिस्थिति में किस तत्व की प्रधानता का वरण करे। चाहे माँ दुर्गा की आराधना हो, चाहे विजयादशमी का अवसर हो, प्रत्येक साँसारिक उत्सव एक ही आध्यात्मिक प्रतीक की ओर इशारा…

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महाराष्ट्र के जितेंद्र थोरात नेपाल के अंतरराष्ट्रीय हिंदी काव्यरत्न पुरस्कार से सम्मानित

14 सितम्बर को राष्ट्रभाषा हिंदी दिवस पर नेपाल की सु-विख्यात साहित्यिक संस्था नेपाल लुंबिनी में एक प्रसिद्ध संस्था शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन द्वारा हिंदी दिवस पर ऑनलाईन नि:शुल्क अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कविता प्रतियोगिता आयोजित की गई। इस प्रतियोगिता में देश-विदेश यथा –नेपाल, भारत, कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और तंजानिया से 6742 रचनाकारों की सहभागिता रही। उत्कृष्ट…

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भारत की एकता शांति समृद्धि और विकास का संकल्प हो

कविता मल्होत्रा (संरक्षक , स्तंभकार, उत्कर्ष मेल) भारत की आज़ादी का जश्न मनाने के लिए राष्ट्रीय ध्वज फहरा देने भर से किसी भी भारतवासी का अपने राष्ट्र के प्रति दायित्व पूरा नहीं हो जाता।भारत की एकता, शांति, समृद्धि और विकास का प्रतीक तिरंगा फहराना कोई रस्म नहीं बल्कि अपने देश के प्रति रक्षात्मक प्रवृत्ति का…

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ये भी एक रास्ता

अनिल बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा है।आखिर आगे ढींगू मंदिर की खड़ी चढ़ाई है, पहुंचना भी बौद्घ गोंपा तक है।पिता जी ने किसी जमाने में यहां शिमला में सस्ते में ज़मीन ले ली थी फिर गांव छोड़ यहीं के हो कर रह गए  थे। अनिल अब नौकरी के सिलसिले में चंडीगढ़ ज़्यादा रहता…

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छाया है पिता

बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। पिता करता नहीं दिखावा कोई आँसू छिपाता अन्तर में अपने। तोड़ता पत्थर दोपहर में भी वो चाहता पूरे हों अपनों के सपने। बरगद की घनी छाया है पिता छाँव में उसके भूलता हर दर्द। भगवान का परम आशीर्वाद है पिता जीवन की इक…

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ये लाल टोपी वाले तेरा नाम तो बता !

राजनीतिक सफरनामा   कुशलेन्द्र श्रीवास्तव अब उत्तर प्रदेश की राजनीति ‘टोपियों’’ पर जाकर उलझ गई है । राजनीति को तो किसी न किसी बिन्दु पर जाकर उलझना ही था सो वह टोपी पर उलझ गई । वैसे तो राजनीति को उलझने के लिए विकास नाम की चादर मिली हुई है पर यह चादर फट चुकी…

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