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तब कविता कुछ कहती है

व्यथा से मन की उर्वर भूमि में भावो का रोपण होता
करुणा संग सींचा जाता शब्दों सेतब कविता कहती है।

वेदना के स्वर पत्थरों पर गुजर कर पिघला देते
रस की धारा बहती कलम चलती तब कविता कहती है।

हृदय की टीस आंसुओं से ना निकल कर कलम से
करुणावर्षा होती धरा के आंचल तब कविता कहती हैं।

बाल्मीकि की तपस्या यूं निरंतर होती वेदना की कड़ी
श्लोक में प्रस्फुटित होती तब कविता कहती हैं।

पीड़ा इतनी व्यापक हो सारी प्रकृति ही समाहित हो
मानवता का विस्तार हो तब कविता होती है।

पर पीड़ा स्व पीड़ा बन जाती उनके दुःख से नींद नहीं
आती तब कलम से सच्ची कविता कहती है।

वेदना का स्तर इतना ऊंचा हो हम जिस पर लिखते खुद
व्याकुल हो जाते तब कविता कहती है।

करती हैं !विचलित मन को जब घटनाएं कलम उठा कर
लिखते सो अपनी वेदनाएं तब कविता कहती है।

जब नयनों में अश्क थम जाते कुछ कहना चाहे उठा कलम
दिल से रचते हैंपन्नों पर शब्द तब कविता कहती है।

जब निर्भया श्रद्धा मरती हिंसा उत्पीड़न से नारियां जलती।
अपनों से छलती तब -तब कविता कहती है।

कवि बनाया नहीं जाता पैदा होता आत्मा वेदना देख ये रोती
कलम उठा कर जो लिखता तब कविता कहती है।

यह कलम नहीं तलवार है ये पैनी धार है, बदल सकती
सत्ता को, परिवर्तन की क्षमता हो ,तब कविता कुछ कहती हे।

सेनानी युद्भभूमि में लड़ते कवि गण भावों की भूमि पर
वेदना की विरह को मथते हैं तब कविता कुछ कहती है।

कवि की लेखनी में समाहित सृष्टि जहां न जाए रवि वहां जाए
कवि खोज पारखी हो, तब कविता कुछ कहती है।

कागज के पन्नों की स्याही ना समझें रंजो गम की परिभाषा

वेदना ज्वालामुखी फटती है, तब कविता कुछ कहती है।

जब -जब इतिहास से होता खिलवाड़, ऑंखों में पट्टी बांध दुनिया सोती ,

वेदना की वजह से कविता कुछ कहती है।

भाव कहीं से हो पत्थरों की छाती से नदियां गुजर लकीरें छोड़ती हैं

तब भावों को कविता कुछ कहती है!

डॉ अरुणा पाठक आभा रीवा

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