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व्यंग्य:  ईर्ष्या की प्रासंगिकता — राजेन्द्र परदेसी

पता नहीं किस मूड में हमारे पूर्वजों ने यह युक्ति गढ़ दी कि “ईर्ष्या कबहूँ न कीजिए”।  मुझे तो ऐसा लगता है कि उन्हें शायद किसी की प्रगति देखी नहीं गई, तभी हताश होकर उन्होंने यह उक्ति बना दी।  वरना यह तो सर्वविदित है कि लोग उसी से ईर्ष्या करते हैं जो प्रगति-पथ पर बढ़ता…

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रिश्तों में दखल देता मौत क्यूंकि समाज में बढ़ रहें पति पत्नि और वो के मामले……! – पंकज सीबी मिश्रा

पंकज सीबी मिश्रा, सामाजिक चिंतक, उप संपादक एवं पत्रकार जौनपुर यूपी  सिया – केतन मामले ने समाज में राजा रघुवंशी मर्डर केस की यादें ताजा कर दी है। ₹600 करोड़ की संपत्ति, ₹17 करोड़ शादी का बजट, बारात के लिए दो चार्टर्ड विमान की बुकिंग  , उदयपुर में पूरा एक शाही लक्जरी 5-स्टार  होटल ,…

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 बेशर्मी और केवल बेशर्मी –  कुशलेन्द्र श्रीवास्तव

अपनी धार्मिकता को महसूस किया जा सके पर ऐसा नहीं हो सका । इन दिनों युवाओें का आचरण अजीब ढंग का महसूस किया जाने लगा है । स्वछंदता और बेशर्मी इसके मानक बन चुके हैं । यही कारण है कि देश के विभिन्न अंचलों मेें ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं । शादी-ब्याह को खेल…

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मर्यादा भूले सभी -डॉ. स‌‌‌रला सिंह ‘स्निग्धा’

  विधा-  कुंडलिया छ्न्द प्रभुवर के दरबार में, मचा शोर चहुंँओर। मर्यादा भूले सभी, देखो चन्दा चोर। देखो चन्दा चोर,अजब हिम्मत दिखलाई। भूल गए हर ज्ञान, बड़ों ने जो सिखलाई। लालच में वह देख, दिखे कब उनको रघुवर। पायेंगे वह दंड, सजा देंगे अब प्रभुवर।। माया ने पागल किया, भूल गए प्रभु नाम। उनके ही…

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मंदिरों में दान न करें…?

पलटें तो पाएँगे कि भारत पर हुए अनेक विदेशी आक्रमणों के पीछे मंदिरों में संचित अपार संपदा भी एक प्रमुख कारण रही है। कुषाणों, हूणों और बाद के अनेक मुस्लिम आक्रमणकारियों की दृष्टि भारत की समृद्धि और मंदिरों में संग्रहित अकूत धन पर रही। सत्ता-विस्तार की महत्वाकांक्षा के साथ-साथ इस संपदा को प्राप्त करना भी…

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अग्नि-जाल में बदलते शहरी भवन — डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत आज विश्व के सबसे तेज़ी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र के विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर निरंतर हो रहे पलायन ने भारतीय शहरों का स्वरूप तेजी से बदला है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक बहुमंजिला इमारतें, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, कोचिंग संस्थान, होटल, अस्पताल…

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विश्व बदला, परिषद क्यों नहीं?

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की अनिवार्यता भारत की स्थायी सदस्यता का दावा और सुधार प्रक्रिया की संरचनात्मक चुनौतियाँ — डॉ. प्रियंका सौरभ द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई, तब विश्व की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक परिस्थितियाँ आज से…

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