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बंजर आत्मा (लघुकथा)

वह भीतर से चुप था — इतना चुप, कि अब उसकी आत्मा भी किसी आहट से नहीं कांपती थी।

सावन की फुहारें बरसतीं तो थीं, पर अब उसकी आँखों में नमी नहीं बची थी। रिश्तों की मिट्टी को सींचते-सींचते वह स्वयं दरक चुका था। भीतर की धरती अब केवल दरारों से भरी थी — वहाँ न बीज टिकते थे, न उम्मीदें उगती थीं।

वह मनुष्य था, पर भीतर से जैसे किसी टूटे हुए दीप की तरह — बुझा हुआ, और फिर भी जलने का अभिनय करता हुआ। उसका मन कभी उपवन हुआ करता था, जहाँ विश्वास की बेलें लहराती थीं, और भावना के पंछी निसंकोच आते-जाते थे। पर अब… वहाँ सन्नाटा था — एक ऐसा सन्नाटा जो केवल आत्मा के बंजर होने पर उतरता है।

लोग आते, बातें करते, वादे करते — और चले जाते। उसने अब शब्दों को परखना छोड़ दिया था। भावनाएँ उसे छूती नहीं थीं, और आघात अब उसे चौंकाते नहीं थे। यह कोई एक रात की कहानी नहीं थी — यह सालों-सदियों की भीतर घटती सूखी ऋतु का परिणाम था।

एक समय था जब वह भीगता था — किसी की मुस्कान में, किसी की वेदना में। पर अब उसका अंतःकरण इतना सूख चुका था कि आँसू भी वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं माँगते थे। वह जानता था — यह सूखा केवल मौसमी नहीं, यह स्थायी है। एक ऐसा बंजरपन, जो खेतों में नहीं, आत्मा में उतरता है — जब जीवन केवल दायित्व बन जाता है, और हृदय केवल शून्य।

एक दिन किसी ने पूछा — “क्या तुम अब भी प्रेम कर सकते हो?” वह क्षण भर चुप रहा… फिर मुस्कराया, एक बंजर मुस्कान — “जिस धरती ने वर्षा पी ही नहीं, वह किसी और के बीज क्या रोपेगी?”

डॉ. सुरेश पुष्पाकर (ग्रेट ब्रिटेन)

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