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प्रेम,love,attracfion : आशा सहाय 

मेरे घर के बरामदे मे कपड़े  सूखने के लिए टाँगीगई एक अलगनी पर एक अत्यंत छोटी सी चिरैया ने पंखों का एक छोटा सा घोंसला बना लिया अथवा यों कहूँ कि लटका लिया है।सफेद छोटे छोटे पंखों का एक आकर्षक घोंसला।आश्चर्य होता है कि कहाँ से उसने इतने छोटे छोटे पंख ढूँढे होंगे।मै चिकित्सीय कारणों से तब महीनों बाहर रही थी।मैंने आकर घोंसले को देखा और अनायास उसकी सुरक्षा की चिन्ता होने लगी। एक स्नेह घहराने लगा। कोई पंखा न चला दै, बरामदे में ज्यादा चहलकदमी न हो, आदि आदि।वह नन्ही सी चिरैया अवसर देखकर उसमें प्रवेश कर जाती और घंटों बैठी रहती। शायद उसमें उसके अंडे होंगे।

        मैं  इतने छोटे जीव केमन मे संतान के प्रति इतनी सुरक्षा की भावना देख चकित हूँ , मन प्रश्नों से भर गया है। यह भावना प्रत्येक जीव में है अवश्य। पर वह कहाँ से आई?अगर यह सिर्फ वात्सल्य है तो मेरे मन  में भी उस संभावित उस नन्हे शिशु के लिए प्रेम और सुरक्षाकी भावना कैसे! अगर यह प्रत्येक जीव के लिए प्रत्येक जीव केमन में भावनाओं का सहज उन्मेष है तब भी प्रश्न ज्यों का त्यों है कि यह हुआ कैसे।

      मैं चारो ओर देखती हूँ सारे विश्व में इसी भावना का फैलाव है। लगता है कि इसी से तो यह विश्व है। किन्तु विश्व में फैले इस प्रेम का जनक कौन है?इसका उत्स क्या अथवा कहाँ है ?पूरे ब्ह्माण्ड में यही प्रेम,  आकर्षण शक्ति के रूप में हर जगह वर्तमान तो नहीं ! और यह मानव मन ! मस्तिष्क से यह अगर जुड़ा है तो मस्तिष्क भी ब्रह्माण्ड का ही प्रतिरूप हैया यों  कहें कि पूर्ण से उद्भूत पूर्णांश है। जीवों में यह प्रेम  अपने जीवन भर कितने खेल खेलता है। हँसता है ,रोता है, प्रतिरूपों का विस्तार करता है।हो सकता है कि ब्रह्माण्ड की यह आकर्षण शक्ति  समान भाव तरंगों वाले जीव से अनायास जुड़ जाती हो।

           मेरी बातें अत्यंत बचकानी लग सकती हैं क्योंकि मै अपनी कल्पना अथवा विचारों के लिए किसी वैज्ञानिक सिद्धांत का सहारा नहीं ले सकती।पर क्या भौतिक अथवा रसायण विज्ञान  मस्तिष्क के अन्दर उत्पन्न इन भावनाओं को पाँच तत्वों अथवा किन्ही विशेष रसायणो की उपस्थिति से जोड़कर निश्चिन्त हो सकता है?अगर हाँ तो हम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड या विश्व के कारक तत्व के रूप में उसे ही स्वीकार कर लेंगे।

किन्तु अगर यह भाव उनकी पकड़ से दूर है—तो उत्तर क्या है?

एक  दृश्य जो रह रह हमें  आकर्षित करता है  वह इस विश्व के जलतत्व के प्रमुख आगार से सम्बद्ध है।सागर की लहरें अगर जीवन की लीला से उपमित हो सकती हैं तो वह आकर्षण जिसक तहत लहरं सागर में समा जाती हैंया एक दूसरे से जुड़ती हैं, भागती हैं  वे क्या  है? सागर के प्रति , लहरों के प्रति प्रेम आकर्षण या एकत्व की इच्छा ,मानवीय या जैविक  प्रेम की इच्छा तो  नहीं !1फिर ये वितृष्णा  का  रूप क्यों  ले लेती  हैं?    

लहरें विद्रोह तो नहीं करतींपरन्तु क्या उनका एक दूसरे से प्रेम है?या उठने और गिरने मे उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है!

क्या है यह।?

law  of  attraction!?

या यह ब्रह्माण्ड का पृथक अनदेखा आयाम है?

कुछ भी हो सकता है।

वे विद्वान भौतिक विज्ञानी कहते हैं कि we are all made of energy.औरsame frequency  की energy  एक दूसरे को आकर्षित करती हैं।कभी कभी मुझे  प्रतीत होता है कि अपने बृहत्तर और परिवर्तित रूप में यही मानव समुदाय अथवा सभी जीवों के मध्य आकर्षण का कारण तो नहीं।

इस आकर्षण और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त ने तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने स्थान पर स्थिरऔर स्थित किया हैसब एक दूसरे से बँधे हुए एक दूसरे से स्वतंत्र भी हैं।

आकर्षण और विकर्षण  दोनो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रकृति मे सर्वत्र दोनो एक दूसरे के पोषक हैं। दोनो एक दूसरे को परिभाषित करते हैं।

बहुत सारे नियमोंकी कल्पना की गयी हैजिन्होंने इस ब्रह्माण्ड को जन्म देने एवम संचालन मे सार्थक भूमिका  का निर्वाह किया है।पर, जन्म चाहे जिस मूल कारण से हुआ हो,पर वे जिस आकर्षण भाव में बँध कर आगे बढ रहे हैं वह है मोह- आकर्षण।जिसे लोग प्रेम की संज्ञा दे देते हैं।यही वह कारक भाव है जिससे संसार बढता चला जाता है।यह संसार चाहे किसी भी जीव का हो।

हमारी सनातन मान्यता कि जीवात्मा परम आत्म का अंश है और विश्व का निर्माण ब्रह्म की लीला है, मानो वह एक नाटृय मंडली का  जनक हो,और मनोवाँछित लीलाएँ एक नियम के तहत कर-करवा  रहा हो। तो ब्रह्म की यह कल्पना शक्ति के रूप मेंयह लीला भी ब्रह्म के इंटेलिजेन्स से जुड़ जाती है,अंततः उससे एकरूप हो जाती हैं।अगर ये सभी प्रेम लीलाएँ भी ऐसे ही समाप्त हो जाती हैं तो हम इससे संपृक्त क्यों हो जाते हैं?   जैसे बुद्ध, शंकर ,विवेका और आदिकाल से अबतक के महर्षिगण हुए?  प्रश्न बहुत टेढ़ा है।

स्थितियों अथवा विषयों को समझने के लिए कई दृष्टिकोणों का सहारा लेना पड़ता है।मेरा ध्यान प्रेम या उसके लिए सम्पूर्ण जगत में प्रयुक्त शब्द Loveको एक energy    की संज्ञा से अभिहित करते हुए      energy of love कहें तो वैज्ञानिक भाषा में आधिक उपयुक्त होगा।वस्तुतः यह एक ऐसा धागा हैजिसने सम्पूर्ण विश्व को बाँधा है। सच तो यह है कियह Love या प्रेम ही वह ब्रह्म हैजो सृष्टि के मूल में है।यह स्वयंभू है, किसी अन्य स्रोत से उत्पन्न नहीं।यह अवसर पाते ही जीवमात्र के मन पर अधिकार लेता हैऔरअपने सातत्य से affection के रूप में संतान ही नही सम्पूर्ण जगत के जड़ चेतन के प्रति प्रेम, आकर्षण के रूप मे प्रतिफलित होता है।इसका विस्तार ब्रह्माण्ड के कण-कण के प्रति हो सकता है। मात्र अपनी संतान या परिवार ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के कष्ट में दुखी होना, रात्रि के आकाशीय पिंडों को लगातार निहारना, उनके प्रति प्रेम का प्रदर्शन ही तो है।सम्पूर्ण विश्व में फैली प्रकृति के विविध स्वरूपों के प्रति आकर्षण अथवा वितृष्णा भी इसी नियम के तहत ही तो है।, वस्तुतःयहीlove  है ,आकर्षण काविशिष्ट रूप।यही है वह attractions –जिसके तहत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक दूसरे से जुड़ा है,और नियत समय पर पृथक हो समाप्ति की ओर बढ जाता है।यही ब्रह्म है।

चिड़ियों का अपनी संतान के प्रति यह प्रेम   वस्तुतः वही प्रेम है जो चर अचर में  एकमात्र उस भाव के रूप मे व्याप्त है जो विश्व का मूल है।जो ब्रह्माण्ड के नाट्य का मूल है।शायद इस भाव की व्याख्या विज्ञान भी नहीं कर सकता।कारण स्वरूप किसी भौतिकता से नहीं जोड़ सकता।यह ब्रहमाण्ड के रचयिता  (अगर कोई है) का कारणभाव है।यही वह कृष्ण राधा का लीला भाव है।

                       अब कुछ कटु स्थितियों के विषय में भी अलग से सोचें। यह जो धृणा ,,वितृष्णा, शत्रुता आदि के भाव हैं उनका अस्तित्व क्यो है?  पुनः हम उसी प्रेम भाव मे झाँकते हैं।प्रतीत होत है कि ये भी प्रेमाकर्षण के अवाँछित स्वरूप है जिसे प्रेमाकर्षण मे परिवर्तित करने की कामना जीवमात्र करता है। ये वे ब्रह्म के स्वरूप है जिन्हें प्रेम भाव में बँध जाने का आह्वान वह ब्रह्म तरह तरह से करता है।परीक्षाओं में डालता है औरअन्ततः उन्हें अपने प्रेम भाव से जोड़ लेता है।हमारी सनातन सत्य से जुड़ी पौराणिक कहानियाँ यही कहती प्रतीत होती हैं।

          अगर यह समूचा विश्व प्रेम से ही संचालित है तो युद्ध तक खींच ले जानेवाली विपरीत भावनाएँ ,कृष्ण के संदर्भ  में  कंस ,कौरवादि और अन्य निंदनीय चरित्र?रामायण के रावणादि चरित्र?इन सबों के प्रति इस प्रेम, love .attraction  की क्या भूमिका है ?उन चरित्रों के भीतर झाँके तो स्पष्ट होगा कि नकारात्मक भावनाएँ भी उसी के प्रतिफल हैं।उपर प्रगट की गई मेरी धारणाएँ संभवतः इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हैं। समझने के लिए सिर्फ अपने अन्तस की गहराईयों में उतरने की आवश्यकता है।

आशा सहाय 

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