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सुरक्षित समाज और कार्यस्थल

पुरुषों की सारथी भूमिका

​एक प्रगतिशील समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ कितनी ऊँची इमारतें हैं,बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ महिलाएँ कितनी सुरक्षित और सम्मानित महसूस करती हैं। घर की चारदीवारी से लेकर दफ्तर के केबिन तक,महिलाओं ने अपनी योग्यता को साबित किया है। लेकिन इस सफर को मुकम्मल और भयमुक्त बनाने की आधी ज़िम्मेदारी पुरुषों के कंधों पर है। महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल तैयार करने में पुरुषों की भूमिका किसी सहायक की नहीं, बल्कि एक बराबर के ‘सारथी’ की है।

​बदलाव की शुरुआत हमेशा घर से होती है। एक पुरुष के रूप में,जब कोई पिता अपने बेटे को अपनी बहन का सम्मान करना सिखाता है,या जब एक पति अपनी पत्नी के सपनों को पंख देता है,तब एक सुरक्षित समाज की नींव पड़ती है। पुरुषों को अपने घरों में ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ बेटों को यह समझ आए कि ‘सहमति’ (Consent) का क्या महत्व है और किसी भी महिला की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता।

​कार्यस्थल (Workspace) पर पुरुषों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। दफ्तरों में अक्सर महिलाओं को अपनी क्षमता साबित करने के लिए पुरुषों से दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे में पुरुष सहकर्मियों (Colleagues) को एक ‘सच्चा साथी’ बनना होगा। इसका मतलब है..

 बैठकों में महिलाओं के विचारों को ध्यान से सुनना, उन्हें बराबर के अवसर देना और ‘मैलशैनिंग’ पुरुषों द्वारा महिलाओं को कमतर आंकते हुए समझाना इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए ​सम्मान केवल अच्छी बातें करने में नहीं, बल्कि दफ्तर के भीतर होने वाले हल्के मज़ाकों,फब्तियों या कलीग्स के बीच होने वाली ‘गॉसिप’ पर रोक लगाने में है। जब एक पुरुष, दूसरे पुरुष के गलत व्यवहार या अभद्र टिप्पणी पर आपत्ति जताता है, तो वह कार्यस्थल को सच में सुरक्षित बनाता है।

​सुरक्षित माहौल का मतलब सिर्फ सीसीटीवी कैमरे या सुरक्षा गार्ड नहीं हैं; इसका असली मतलब है ‘सोच का सुरक्षित होना’। जब महिलाएँ काम के सिलसिले में देर रात घर लौटें,तो सड़कों और सार्वजनिक वाहनों में पुरुषों की निगाहों में डर पैदा करने वाला घूरना नहीं,बल्कि एक सहज सुरक्षा का अहसास होना चाहिए।

*​राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त* ने लिखा था, “आँचल में है दूध और आँखों में पानी।” लेकिन *आज की नारी* के आँखों में पानी नहीं,बल्कि *आसमान छूने* के हौसले हैं। *पुरुषों को बस इतना करना है कि वे उनके रास्ते की रुकावट बनने के बजाय,उस रास्ते को थोड़ा और सुगम और सुरक्षित बना दें। जब पुरुष और महिलाएँ कंधे से कंधा मिलाकर, एक-दूसरे के प्रति आदर का भाव लेकर चलेंगे,तभी एक सच्चे,सुंदर और समतावादी समाज का निर्माण होगा।*

UMA MEHTA TRIVEDI, Karnataka

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