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व्यंग्य : दलाल नहीं, ब्रांड-एम्बेसडर हूँ 

–राजेन्द्र परदेसी

देश हो या आम आदमी, उसकी प्रगति का आँकलन उसकी विकास-यात्रा की गति से ही किया जाता है। तभी तो लोगों को अक्सर यह कहते सुना है — “फलाँ तो बहुत जल्दी इतना बड़ा आदमी बन गया।” आम तौर पर ‘बड़ा आदमी’ का अर्थ हमारे समाज में धन या किसी बड़ी कुर्सी पर आसीन होने से जोड़ा जाता है। साहित्यकारों के साथ भी यही है। वह कितना भी चर्चित लेखक क्यों न बन जाए, परिचित मिलने पर पहला सवाल यही करते हैं — “आजकल क्या कर रहे हो, कविता-कहानी से इतर?”

चरणदास भी समाज में ही रहते हैं। ऐसे सवालों का सामना उन्हें भी करना पड़ा होगा। साहित्य-क्षेत्र में कदम रखते ही उन्होंने अपने घर में ही एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का नाम जोड़कर एक संस्था बना ली और स्वयं उसके अध्यक्ष बन गए। पहले तो अपनी संस्था से शहर के ही साहित्यकारों को सम्मान-शुल्क लेकर सम्मानित किया। दो-चार साल में ख्याति बढ़ी तो अन्य शहरों और महानगरों के साहित्यकारों ने उनसे सम्पर्क करना शुरू किया। जो साहित्यकार जितना अधिक ‘सहयोग’ करता, उसे उतने ही बड़े शब्दों से सम्मानित करते।

पर चरणदास कोई साधारण प्रतिभा के साहित्यकार तो थे नहीं जो इतने से संतुष्ट होकर बैठ जाते। जिस तरह गाँव-स्तर के नेताओं की भी चाह होती है कि वे ग्राम सभा से उठकर विधान सभा में पहुँच जाएँ, फिर मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने आकाओं के दरवाज़े पर जा-जाकर नाक रगड़ें — वैसे ही चरणदास के मन में भी यही भाव सदा उठता रहता। वे सदा यही सोचते — इस तरह छोटी संस्था और मात्र दो-चार पुस्तकों के सहारे पहचान बनने वाली नहीं। उसके लिए आवश्यक है किसी सरकारी संस्था का अध्यक्ष या किसी मंत्रालय में किसी समिति का सलाहकार बनना। तभी ‘राष्ट्रीय’ पहचान बनेगी।

यह सोचकर वे अपने लक्ष्य को पाने की राह तलाशने में जुट गए। इसके लिए सबसे पहले उन सभी सरकारी संस्थाओं की सूची बनाई। फिर उनकी चयन-प्रक्रिया की जानकारी एकत्र की। उसके बाद चयनकर्ताओं के नाम तलाशे और यह पता लगाया कि चयन के लिए उनके क्या मापदंड होते हैं। क्योंकि उनका मानना था कि संस्था का मापदंड कुछ भी हो, मुख्य तो वे लोग होते हैं जो चयन करके नामित करते हैं। वे खुश तो आप संस्था के सभी मापदंडों पर अपने-आप खरे उतरेंगे।

अपनी विकास-यात्रा को गति देने के लिए चरणदास जी ने अपनी कार्य-शैली बदलकर सत्ता के नज़दीक पहुँचने के प्रयास तेज़ कर दिए। इसलिए एक दिन अपने शहर के चर्चित विधायक के निवास-स्थान पर पहुँचे। उद्देश्य था — अपने सम्मान-समारोह के कार्यक्रम में उन्हें मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण देना।

विधायक जी ने पहले समयाभाव का नाटक किया, फिर मन में सोचा — इसी बहाने साहित्यकारों के बीच भी पहचान बन जाएगी। वैसे भी किसे सार्वजनिक रूप से माला पहनना और अपनी प्रशंसा सुनना पसंद नहीं?

चरणदास जी ने विधायक जी का जमकर स्वागत-सत्कार किया। इसका परिणाम मिलना ही था। विधायक जी ने चरणदास जी की ‘प्रतिभा’ पहचानकर उन्हें अपना सहायक बना लिया। जब कहीं बाहर जाते, चरणदास को साथ ज़रूर ले जाते।

भूखे को क्या चाहिए? खाने को दो रोटी। चरणदास जी भी विधायक जी को सीढ़ी बनाकर सत्ता के शिखर तक पहुँचने में सफल हो गए। राजधानी के नेताओं से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों तक के वे दुलारे बन गए।

चरणदास जी सत्ता के गलियारों में केवल भटकने के लिए तो आए नहीं थे। एक दिन अपने खास साहित्यकार-मित्र के साथ राज्य के शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय में जा धमके। वहाँ मंत्री जी के साथ उनका सचिव भी बैठा था।

राज्य की सभी साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए अध्यक्ष चुनने पर विचार हो रहा था। तभी सचिव ने चरणदास जी की ओर देखकर कहा, “आप तो स्वयं एक जाने-माने साहित्यकार हैं, श्रीमान। आप भी अध्यक्ष के लिए कुछ नाम सुझाइए।”

सचिव का इतना कहना था कि चरणदास के खास साहित्यकार-मित्र तुरंत बोल पड़े, “हमारे चरणदास जी भी तो किसी से कम हैं क्या इन संस्थाओं के अध्यक्ष बनने के लिए?”

तवा गरम देखकर चरणदास जी नखरे दिखाते हुए बोले, “अरे, आप कैसी बातें कर रहे हैं! हम तो मंत्री जी का केवल दर्शन करने आए हैं, यहाँ अध्यक्ष बनने थोड़े ही। वैसे मंत्री जी का आदेश होगा तो उनके चरणों में बैठकर समाज के लिए अच्छा ही करने की कोशिश करूँगा।”

तीर निशाने पर लगा। मंत्री जी ने उसी समय अपने सचिव से कहा, “ठीक है, श्री चरणदास जी को ही एक संस्था का अध्यक्ष मनोनीत कर दीजिए।”

चरणदास जी के साहित्य-संस्थान का अध्यक्ष बनने का समाचार अखबार में छपते ही तथाकथित महान साहित्यकारों में हलचल मच गई। आलोचना और प्रशंसा के स्वर लोग अपने-अपने स्वार्थ से उठाने लगे।

पर चरणदास जी भी कोई साधारण आदमी तो थे नहीं। घाट-घाट का पानी पीकर यहाँ पहुँचे थे। उन्होंने तुरंत पुरस्कारों के लिए नाम आमंत्रित किए और अपने कटु आलोचकों के बीच बाँटकर सबका मुँह बंद कर दिया। जो उनके प्रशंसक थे, वे तो पहले से ही साथ थे। इसलिए संस्थान के हर कार्यक्रम में ससम्मान आमंत्रित होते रहते और अर्थ-लाभ बटोरते रहते।

आज कई साल हो गए। सरकारें भी कई बदलीं, लेकिन हर सरकार में चरणदास जी सत्ता के नज़दीक बने ही रहे। क्योंकि सत्ता के नज़दीक रहने का गुण उनमें आ गया था। भले ही साहित्यकारों के बीच उनकी पहचान एक चाटुकार की सदा रही।

इसीलिए जब भी कोई उनकी चाटुकारिता को लेकर आलोचना करता, तो वे स्वयं यही कहते, “भाई साहब, मैं साहित्य का दलाल नहीं हूँ, बल्कि साहित्यकारों का ब्रांड-एम्बेसडर हूँ।”

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