गोकुल ने रंग लगाया
सतरंगी डोली में बैठीहोली आई रे। ऋतु बसंत की ओढ़ चुनरिया होली आई रे। मधुऋतु की आंखों को जब,मौसम ने किया गुलाबी,बासंती बयार ने फागुन,को कर दिया शराबी। झूम-झूम कर फाग सुनाती होली आई रे। हर आंगन में रंग बिछे हैंमन की चूनर गीली,धरती गगन हुए सतरंगे,प्रकृति हुई रंगीली। लगा प्रीति का काजल देखो होली…
