दूरियाँ_और_दायरे
जब-जब सिमटती है, एक स्त्री दायरे में। दूरियां बनाती है, वह अपनी कामयाबियों से। देह और प्रजनन के दायरों में सिमटकर , बढ़ती है दूरियां उसकी उपलब्धियों से । एक स्त्री भी जन्मी है ,अपना स्वतंत्र वजूद लेकर। फिर दायरो की सीमा में सदैव क्यों बंधी रही? विवेक व ज्ञान से जिसके वजूद का निर्माण…
