खुलेआम जनमत की खिल्ली उड़ रही है
संसद के अंदर जब शोर-शराबा होता है, अनर्गल ही घात-प्रतिघात होने लगता है। मेहनती जनता की कमाई की बर्बादी पर, जनप्रतिनिधियों का ध्यान नहीं जाता है। संसद में एक मिनट के बहस में व्यय, सुनते हैं उनत्तीस हजार रुपये हो जाता है। सुविधाभोगी जननेता ईमानदारी से सोचें, खर्च होने वाला सब धन कहां से आता…
